आदिवासी युवा शक्ति की प्रतिभा निखारने का मंच 

गुलाब बत्रा


जयपुर। सदियों से राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग-थलग ,जैसे तैसे जीवन यापन की चुनौती झेल रहे आदिवासी समाज की युवा शक्ति अवसर मिलते ही अपनी प्रतिभा की झलक दिखाने से नहीं चूकती । ऐसा ही नजारा नेहरू युवा केन्द्र संगठन,राजस्थान एवं युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय,भारत सरकार द्वारा जयपुर में आयोजित करवाये जा रहे बारहवें आदिवासी युवा आदान प्रदान कार्यक्रम में देखने को मिला । 
सात दिवसीय षिविर के कार्यक्रम में नक्सल प्रभावित षिविर के कार्यक्रम में नक्सल प्रभावित राज्यों उड़ीसा,आन्ध्र प्रदेष ,महाराष्ट्र और तेलंगाना के युवा लड़के-लड़कियों के लिये भाषण प्रतिभोगिता आयोजित की गई । इसका विषय था ‘‘आतंकवाद/नक्सलवाद बनाम विकास‘‘ । वर्तमान की आधुनिक एवं भौतिक चकाचैंध से कोसों दूर इस युवा शक्ति का मंच पर आना, किसी तरह माइक पकड़ना और फिर अपनी बात कहना किसी अचम्भे से कम नहीं था । भाषण प्रतियोगिता में इक्का - दुक्का प्रतिभागी घबरा भी गये लेकिन सहयोगी संभागियों की हौसला अफजाई से उनका मनोबल बना । नतीजतन कुछ वक्ताओं ने पूरे जोष खरोष के साथ अपनी बात रखी । दो- तीन वक्ताओं की भाषण शैली तो राजनेताओं की बराबरी कर गई । यही नहीं कुछ वक्ताओं ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तर्ज पर श्रोताओं से संवाद करते हुये अपना भाषण पूरा किया और श्रोताओं से जमकर तालियां बटोरी । 
भाषण प्रतियोगिता के संभागियों ने  एक-एक कर नक्सलवाद के इतिहास से जुड़े पृष्ठ खोले और उनकी करतूतों का लोमहर्षक वर्णन भी किया । नक्सलियों की बर्बरता तथा विकास कार्यो में हर कदम बाधायें खड़ी करने का उल्लेख किया । अपने इलाके की दयनीय स्थिति बताते समय कई वक्ताओं का गला रूंध गया । आदिवासी क्षेत्रों में आधारभूत ढंाचे की कमी तथा षिक्षा,चिकित्सा तथा जरूरी सुविधाओं के अभाव की चर्चा ने श्रोताओं को स्तब्ध कर  दिया । एक वक्ता ने बताया कि उनके गांव में केवल सातवीं कक्षा तक पढ़ाई की व्यवस्था है । आगे पढ़ाई नहीं कर पाना उनकी मजबूरी है । नक्सलियों के डर से कई बार षिक्षक स्कूल नहीं पहुंचते तो कई मर्तबा विद्यार्थी गैरहाजिर होने को मजबूर होते है ।              


मां बाप अपने बच्चों को स्कूल भेजने से डरते है । एक वक्ता ने कहा कि वह अपने गांव में सबसे अधिक पढ़ा लिखा है लेकिन इसके लिये उसे गांव से दूर एक इलाके में जाना पडा । वहा किसी दूकान पर काम करते हुये षिक्षा हासिल की । नई वेषभूषा में गांव आने पर उसे मां बाप द्वारा टोका जाता है कि ऐसी पोषाक पहनने पर नक्सलियों से उसकी जान को खतरा हो सकता है । अन्य वक्ता ने शहरों में तथा फिल्मों में डिस्कोडांस का उल्लेख करते हुये कहा कि हमारे यहां तो शादी विवाह ही मनोरंजन के साधन होते है । 
वक्ताओं का यह भी कहना था कि सामाजिक आर्थिक विषमता ,भुखमरी,गरीबी,बेरोजगारी तथा आदिवासियों को उनके अधिकारों से वंचित रखने के कारण नक्सलवाद को पनपाने में मदद मिली । इन तत्वों ने असहाय आदिवासियों की मजबूरी का खुलकर लाभ उठाया । वहीं आदिवासियों को आधारभूत सुविधाओं तथा विकास की धारा से भी दूर रखा गया । 
नक्सली गतिविधियों की रोकथाम के लिये भी वक्ताओं ने सुझाव दिये । कुछ वक्ताओं का कहना था कि नक्सलियों को प्यार से समझा बुझाकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की पहल करनी चाहिये । यह भी संभव है कि कुछ भटके हुये युवाओं को मजबूरन इन गतिविधियों से जुड़ने के लिये बाध्य किया गया हो । ऐसी स्थिति में उनके परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी का भरोसा देकर उन्हें आत्म-समर्पण करने को कहा जा सकता है । इस सिलसिले में सम्राट अषोक के कलिंग युद्ध के बाद ह्दय परिवर्तन तथा भविष्य में अहिंसा का मार्ग अपनाने का भी उदाहरण दिया गया । 
वक्ताओं का यह भी कहना था कि पहले नक्सली आदिवासियों को भ्रमित करते,डराते थे लेकिन अब स्थिति में बदलाव आया है । सुरक्षा बलों तथा आदिवासियों में आपसी समझ तथा विष्वास बढ़ा है । 
एक स्थान पर नक्सलियों ने चुनाव नहीं कराने की धमकी दी लेकिन ग्रामीणों ने एकजुट होकर निडरता से चुनाव सम्पन्न कराया । इसी संदर्भ में गुणवत्तापूर्ण षिक्षा व्यवस्था के साथ युवाषक्ति को आगे बढ़ाने की बात की गई । भाषण प्रतियोगिता के दौरान अधिकांष वक्ताओं ने नक्सली गतिविधियों के खिलाफ डटकर मुकाबला करने पर बल दिया । हमें अपना दीपक खुद बनकर विकास को साधना होगा तथा जिंदगी को और बेहतर बनाने की दिषा में अग्रसर रहने की पहल करनी होगी । युवाओं में अपने मन को मजबूत करने तथा अपनी प्रतिभा पहचानने पर भी बल दिया गया । डर के आगे जीत की भावना से विकास का मूल मंत्र सिद्ध होगा ।