अनचाहे को मनचाहा बना लेना ही जीवन की कला है: आचार्य सुधांशु जी महाराज

जयपुर। विश्व जागृति मिशन के संस्थापक और देश के जाने माने अध्यात्मवेत्ता आचार्य सुधांशु जी महाराज ने कहा कि भगवान संतुलन बनाते है, इसलिए हमें सृष्टि अच्छी लगती है। संतुलित और खुश रहना ही साधना के पथ पर चलने वालों के जीवन की कला होती है। उन्होंने कहा कि हर कोई सपाट जिंदगी चाहता है, मगर जीवन का पथ कभी ऐसा नहीं होता।  जीवन   में जब तक ऊंचा—नीचा या उतार—चढ़ाव है, तब तक ही जिंदगी है। पहाड़ ऊंचे—नीचे होते हैं, नदी और समुद्र की लहरें  भी ऊपर नीचे उठती रहती हैं।

 

विश्व जागृति मिशन के आचार्य सुधांशु जी महाराज ने रविवार को जयपुर में जवाहर नगर स्थित माहेश्वरी पब्लिक स्कूल में सम्पन्न 'गुरुमंत्र सिद्धी साधना' कार्यक्रम में बड़ी संख्या में मौजूद लोगों को मंत्र साधना के गुर सिखाते हुए ये बात कहीं। उन्होंने कहा कि जीवन में सब कुछ मनचाहा नहीं मिलता, अनचाहा भी मिलता है। अनचाहे को मनचाहे में बदल लेना ही जीवन की कला है, जिसे साधना के पथ पर चलने वालों को अपनाना अनिवार्य है। जीवन में जो कुछ भी मिला है, उससे कमाल हो सकता है। आगे कुछ मिले इसके लिए प्रयास अवश्य करे, पर न मिले तो बैचेन न हो। गुरुवर ने कहा कि जिंदगी बहुत कुछ देती है, जो है  उसे  स्वीकार करे, संतुष्ट रहे और रोज परमात्मा का धन्यवाद अदा करे। शिकायत करने वाला कभी भक्ति नहीं कर सकता।

 

प्रखर आध्यात्मिक संत सुधांशु जी महाराज ने कहा कि जीवन में आगे बढ़ने और साधना के पथ पर चलने के लिए लचीलापन जरूरी होता है। साधक माफ करना सीखें, रिश्तों को बर्दाश्त करे और कभी—कभी झुक भी जाए। इंसान झुकने से ही ऊपर उठता है। क्षमा भगवान को भी पसंद है। जिंदा आदमी ही झुकना जानता है, नम्र रहने से ही साधक को ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है। उन्होंने जीवन में स्वयंसेवक की तरह रहने और खुशियों के लिए स्वयं पर निर्भर रहने की सीख देते हुए कहा कि जो व्यक्ति दूसरों पर निर्भर रहता है, वह कभी खुश नहीं रह पाएगा। साधक ऐसा होता है, जिसकी सभी को जरूरत महसूस होती है, वह किसी के लिए बोझ नहीं बनता, किसी को उसके कारण कठिनाई नहीं होती, यहीं सही मायने में आत्म निर्भरता है।

 

विजामि प्रमुख ने साधकों को ओंकार का महत्व समझाते हुए बताया कि सृष्टि की शुरूआत इस 'ऊं' की पवित्र ध्वनि के साथ ही हुई। यह ऐसी ध्वनि है, जिसे  मूक  व्यक्ति् भी  बोल सकता है। आचार्यवर के निर्देशन में सत्र में साधकों ने समवेत स्वरों में ओंकार का गहन अभ्यास किया, जिससे  तक्षशिला आडिटोरियम में ऊर्जा की अविरल लहरें बहने लगी। उन्होंने प्राणयाम के साथ ओंकार की ध्वनि, अनुलोम विलोम प्राणायाम के साथ—साथ श्वास—श्वास में गुरुमंत्र और 'ऊं नम' शिवाय' मंत्र के प्रयोग का भी सभी को अभ्यास कराते हुए कहा कि प्राणायाम के साथ जाप भी हो जाए तो इससे जीवन में कमाल होने लगेगा।

 

आचार्य सुधांशुं जी महाराज ने शरीर में मौजूद तीन शक्ति् केन्द्रों की विस्तृत व्याख्या की। नाभि केन्द्र, ह्रदय केन्द्र और आज्ञा चक्र को ओंकार के अभ्यास से जागृत करने के तरीके भी बताएं। कार्यक्रम के समापन अवसर पर सुधांशु जी महाराज का गुलाबीनगर वासियों की ओर से न्यायमूर्ति दीपक माहेश्वरी तथा विश्व जागृति मिशन जयपुर मंडल प्रधान मदनलाल अग्रवाल, उप प्रधान नारायण दास गंगवानी, रमेश चंद्र सेन, द्वारकाप्रसाद मुटरेजा और गोपाल बजाज सहित मंडल पदाधिकारियों ने  नागरिक अभिनंदन किया गया। कार्यक्रम का समन्वयन नई दिल्ली से आए विश्व जागृति मिशन के आचार्य अनिल झा ने किया।