भगवत कृपा से ही प्राणी मात्र को घर, परिवार, जाति, समाज, संस्कृति, धर्म, स्थान जिला, राज्य, राष्ट्र में जन्म लेने का अवसर मिलता है। इंद्रेश कुमार

अजय नागर।

 

जयपुर/काठमांडू। भगवत कृपा से ही प्राणी मात्र को घर, परिवार, जाति, समाज, संस्कृति, धर्म, स्थान जिला, राज्य, राष्ट्र में जन्म लेने का अवसर मिलता है। जो चीज हमें इश्वर ने दी है उसे प्रलोभन द्वारा, छल द्वारा बदलना अर्थात धर्म परिवर्तन करना महापाप हैं। ये विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य इंद्रेश कुमार जी ने नेपाल की बागमती नदी के किनारे स्थित श्रीकृष्ण प्रणामी मंदिर के सभागार में नेपाल संस्कृति परिषद अंतरराष्ट्रीय के चार दिवसीय महासम्मेलन को संबोधित करते हुए रखें।

 

इंद्रेश कुमार जी ने आगे कहा कि नेपाल में बडी़ तेजी से हिन्दू बौद्धों का धर्मान्तरण किया जाना नेपाल राष्ट्र के लिए एक गंभीर खतरा है। नेपाल राष्ट्र की पहचान पशुपतिनाथ, गौतम बुद्ध की जन्मस्थली लुम्बिनी, माता सीता की जन्मभूमि जनकपुर से हैं, मुक्तिनाथ से हैं, सती माता गुहेश्ववरी, मनोकामना, बूढ़ा नीलकंठ, सगरमाथा आदि से है। अतः इनकी शुद्धता व पवित्रता हर हाल में बचाए रखना चाहिए तभी नेपाल राष्ट्र बचेगा। नेपाली संस्कृति परिषद समाज में संस्कृति जागरण का आन्दोलन हैं। उन्होंने आव्हान किया कि सभी नागरिक, दल व समूहों को आगे आकर इसकी रक्षा, प्रचार व जागरण हेतू काम करना चाहिए।

 

चार दिवसीय सम्मेलन और पशुपतिनाथ यात्रा के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए नेपाल के पूर्व उप प्रधानमंत्री प्रकाशमान जी ने कहा कि नेपाली संस्कृति एक समृद्ध संस्कृति है, परन्तु आज पश्चिमी संस्कृति के कारण इसे गम्भीर खतरा है। संस्कृति समाप्त होते ही हमारी पहचान, फिर राष्ट्रीय पहचान समाप्त हो जाएगी।इस लिए आज संस्कृति स्वधर्म पराम्पराओं का संरक्षण संवर्धन आवश्यक है। नेपाली संस्कृति परिषद यह कार्य कर रही है, यह एक सराहनीय कार्य है।

 

परिषद के अन्तर्राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री श्री 108 मोहन प्रियाचार्य ने अपने संबोधन में कहा हिन्दू धर्म व संस्कृति विशाल है। बौद्ध, जैन, और सिख प्रकृति पूजकों में समानता है इसलिए सभी को मिलके काम करने का समय है, संस्कति के अच्छाईयों, सच्चाईयों को आचरण में लाना चाहिए। नेपाली संस्कृति परिषद समाज की सेवा, सम्मान, जागरण व संगठन हेतू  कार्य कर रहा है। परिषद समाज व राष्ट्र हित रक्षा में अग्रणी है तथा समाज के लोग अधिक से अधिक संख्या में परिषद से जुड़े।

 

परिषद के अन्तर्राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष अशोक चौरसिया ने कहा कि कभी एक सूत्र में बंधा समाज आज जाति, उपजाति, उप भाषा के नाम पे विभाजित हो रहा है। कुछ धुर्त व दुष्ट शक्तिया समाज को तोड़ने व कमजोर करने का वर्षों से षणयंत्र करते आ रहीं है। हमें इन शक्तियों को पहचानना होगा। नेपाली समाज के सभी वर्ग जैसे राई लिम्बू तामंग, मगर, जोगी संयासी, नेवार, कामी दमाई शार्की शेर्पा धीमाल, थारु, ब्राह्मण छेत्री आदि की साझा परम्परा संस्कृति नेपाली संस्कृति है। इसके संरक्षण संवर्धन व नवजागरण तथा सम्पूर्ण नेपाली भोटिया लेप्चा समाज में एकता व साझा संस्कृति धर्म परम्परा के संरक्षण  हेतू परिषद कार्य कर रहा है। अपने राष्ट्र धर्म, संस्कृति, परम्परा, भेष, भाषा आदि पर हम सभी को गर्व होना चाहिए। हमें तोड़ने वाली, आपस में लडा़ने वाली शक्तियों से समाज को सावधान व एक जूट रखना आज की आवश्यकता है। भारत नेपाल के संबंधों को तोड़नेवाली शक्तियां छल - बल के सभी हथकण्डे अपना कर सक्रिय हैं। समय रहते इन शक्तियों को पहचानने तथा इनके जाल से बचने व परास्त करने की आवश्यकता है। ये शक्तियाँ ही वस्तव में नेपाल, नेपाली समाज, एकता व अखण्डता की शत्रु हैं।

 

चार दिवसीय समारोह के समापन सत्र में बोलते हुए नेपाली कांग्रेस के महासचिव शशांक कोइराला ने नेपाली संस्कृति परिषद के कामों की प्रशंसा करते हूए कहा आज की परिस्थिति में संस्कृति जागरण अनिवार्य है तथा संस्कृति जागरण से राष्ट्र जागरण व राष्ट्र जागरण से राष्ट्र रक्षा संभव है। परिषद के कार्य विस्तार में हर सहयोग का आश्वासन दिया। नेपाली कांग्रेस के सांसद दिलेन्द्र बडू़ ने कहा कि सामाजिक एकता, समाज रक्षा ,सामाजिक सौहार्द केवल व केवल संस्कृति व संस्कारों से ही सम्भव है।नेपाली संस्कृति परिषद ने इस काम को करने का संकल्प किया है। परिषद से हर नागरिक को जुड़ना चाहिए।

 

मीडिया प्रभारी अशोक सिंह कसारा ने बताया कि महासम्मेलन को अनेक वक्ताओं ने संबोधित किया जिनमें हिन्दू स्वयंसेवक संघ नेपाल के सह संघचालक कल्याण तिमसिंहा, राष्ट्रीय प्रचारक वेद प्रकाश, जनजाति कल्याण आश्रम के संगठनमंत्री मिलन भट्ट, सन्त अमृतराज महाराज, स्वामी इश्वर चैतन्य महाराज, हरी प्रसाद उपाध्याय, दिनेश सोनी, पवित्रा दाहाल,आमिया छेत्री, दीलिप सिरवाल, राजेन शिवाकोटी, शास्त्री खेमराज आचार्य, कमल सिंह, महेन्द्र शर्मा, जनक राज, बलबाहादुर थापा, अनन्त भण्डारी, कृष्ण पाण्डे, संजय गुरुंग, कृष्ण प्रसाद भट्टराई आदि थे।

 

 परिषद के चार दिवसीय अंतरराष्ट्रीय महासम्मेलन के संचालन व व्यवस्था में हर्कबहादुर स्वार, बाम स्वार व चक्रपाणि गौतम का सक्रिय योगदान रहा। चार दिवसीय सम्मेलन और पशुपतिनाथ यात्रा में भारत के 16 राज्यों तथा अस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, ब्रुनोई, युरोप, अमेरिका, भूटान तथा नेपाल के सातों प्रान्तों से 470 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। भारत से सात सदस्यीय पत्रकारों ने भी भाग लिया। समारोह समाप्ति पश्चात परिषद द्वारा आगुन्तको को काठमांडू के धार्मिक स्थानों के दर्शन कराएं गए। अंत मे परिषद के अंतरराष्ट्रीय महासचिव हर्क बहादुर ने सभी अथितियों और आगुन्तको का आभार व्यक्त किया।