चित्रांकित है संविधान निर्माताओं के सपनों का भारत-5


लक्ष्मीनारायण भाला


स्वतंत्र भारत के संविधान की उद्देश्यिका में जिन पांच बातों की स्वतंत्रता सुनिश्चित की गई है वे पांच बिंदु हैं, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म एवं उपासना। विचार सोच से बनते हैं, अभिव्यक्ति शब्दों तथा भाव-भंगिमाओं से प्रकट होती है, विश्वास बुद्धि के तर्कों से स्थापित होता है, धर्म श्रद्धा से धारण किया जाता है एवं उपासना भक्तिभाव से पालन की जाने वाली क्रिया है। अर्थात सोच, भाषा, तर्क, श्रद्धा एवं भक्ति के द्वारा हर व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारने की स्वतंत्रता संविधान हमें प्रदान करता है। साथ ही संविधान ने यह भी माना है कि व्यक्ति की गरिमा इसी में है कि राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने वाली बंधुता को बढ़ाने के लिए वह दृढ़ संकल्पित हो।



अपने संविधान को 26 नवंबर 1949 के दिन अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हुए हम भारत के लोग गौरवान्वित होकर 26 जनवरी 1950 से इसे क्रियान्वित करने में लगे हुए हैं। संविधान की उद्देश्यिका में नागरिकों के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय के साथ प्रतिष्ठा एवं अवसर की समानता को भी सुनिश्चित किया गया है। भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुता संपन्न, समाजवादी, पंथ निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए कृत संकल्प हम भारत के लोगों के लिए यह संविधान ही हमारा धर्मग्रन्थ है। इसे उसी श्रद्धाभाव से हम सब देखें यह स्वाभाविक है। यही अपेक्षित भी है अथवा यदि कहा जाए कि यह अनिवार्य है तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी।


भारत के संविधान में अब तक 122 संशोधन हो चुके हैं। परन्तु सन 1956 में किया गया संशोधन अपने आप में एक उदाहरण बन गया। संविधान अंगीकृत करने के बाद सातवें वर्ष में किये गए इस सातवें संशोधन से संविधान का सातवां भाग ही निरस्त हो जाता है। सातवें भाग में केवल एक ही धारा (धारा 138) थी। उस एक धारा को निरस्त करने वाले संशोधन के कारण एक भाग का ही निरस्त हो जाना एक अद्भुत संयोग ही कहा जाएगा। प्रश्न यह है कि आखिर क्या था उस धारा में? पूरी धारा को ही निरस्त करने की आवश्यकता क्यों पड़ी?इस भाग पर कौन सा चित्र अंकित था?क्या था उसका भावार्थ? इन सब प्रश्नों का उत्तर खोजना जरूरी है।



मूल संविधान की अनुसूची (1) में राज्यों की सूची दी गई थी। क, ख, ग, घ इन चार हिस्सों में क्रमश: 9+9+10+1 कुल उनतीस राज्यों की सूची थी। तत्कालीन राजे-रजवाड़ों तथा नवाबों के राज्यों के विलीनीकरण के समय की गई शर्तों के आधार पर इन राज्यों को सूचीबद्ध किया गया था। संविधान रचना के समय से ही यह मांग उठायी जा रही थी कि प्रांत रचना भाषा के आधार पर हो। तेलुगु भाषी राज्य की मांग, उसके लिए आमरण अनशन, अनशन करने वाले का बलिदान और अंतत: 1953 में आंध्र राज्य का गठन होना, यह भाषा आधारित प्रांत बनने का पहला उदाहरण बन चुका था।



यद्यपि 1949 में ही जवाहर-वल्लभ-पट्टाभि अर्थात जेवीपी समिति बना दी गई थी जिसे राज्य रचना की नीति निर्धारित करनी थी। उनके सुझावों पर खुली बहस एवं आंध्र जैसे अन्य भागों में हो रहे आंदोलनों के कारण इसके क्रियान्वयन में विलम्ब होता रहा। अंतत: 1956 में लाये गए संशोधन के आधार पर अनुसूची (1) एवं (2) और धारा 138 पर उसका असर पड़ा। अनुसूचि (1) चार हिस्सों से सिमटकर दो हिस्सों में रह गई और राष्ट्र अर्थात परिपूर्ण राज्य और केंद्र-शाषित राज्य। राज्य पुनर्गठन की प्रक्रिया के कारण ही यह मौलिक परिवर्तन हुआ।



इस भाग पर जो चित्र अंकित है वह मौर्य काल की विशेष परिस्थिति को उजागर करता है। बौद्ध मत के आधार पर राज्य करने वाले सम्राट अशोक के समय भारतीय राज्य के विस्तार एवं विदेश में भी उसकी स्वीकार्यता को दर्शाने वाला यह चित्र है। गहनों से श्रृंगारित महिलाएं शरीर पर उध्र्व वस्त्र न होते हुए भी निर्भय होकर विचरण कर रही हैं, पुरुष वर्ग निर्विकार भाव से इन महिलाओं के साथ कार्यमग्न है। भय और विकार से मुक्त समाज के इस स्वरुप को दर्शाता यह चित्र सम्राट अशोक के सपनों का भारत बनाने की आकांक्षा को प्रकट करता है। इस भाग के निरस्त होने के कारण संविधान निर्माताओं की आकांक्षा एवं सपना निरस्त न हो जाए, यह देखना जरूरी है। अत: इस चित्र को संविधान के आठवें भाग का हिस्सा बना लेना उचित होगा।



आठवें भाग में धारा 239 से 242 तक कुल चार धाराएं हैं। यद्यपि सातवें संशोधन के कारण धारा 242 भी निरस्त हो चुकी है अत: आठवें भाग में केवल तीन धाराएं ही बचती हैं। इन धाराओं में भारत के राज्य क्षेत्रों का प्रशासन, तदर्थ विधानमंडल एवं मंत्री परिषदों का गठन, दिल्ली के विषय में विशेष उपबंध, संंवैधानिक तंत्र विफल होने पर अध्यादेश जारी करने का अधिकार क्षेत्र आदि बातों को स्पष्ट किया गया है।



प्रशासन से सम्बंधित इस आठवें भाग पर फलों से लदे वृक्ष, ऊंचे-ऊंचे मकान एवं छलांग लगाता हुआ एक सु-संपन्न पुरुष चित्रांकित है। गुप्त काल की परिस्थिति को दर्शाने वाले इस चित्र में उड़ान भरने वाला यह पुरुष कुबेर है। कुबेर हनुमान के पराक्रम से अनुप्राणित एवं प्रभावित रहे हैं। उन्होंने अपनी चमत्कारिक गदा हनुमान को दे दी थी।



युद्ध या संघर्ष से दूर रहकर धन अर्जन के लिए उन्होंने अपनी ऊर्जा खपा दी। खतरे मोल लिए बिना धन अर्जित नहीं हो सकता, यह दर्शाने के लिए कुबेर को हनुमान के समान छलांग लगाते हुए दिखाकर सर्वांगीण विकास के प्रतीक के रूप में उन्हें चित्रांकित किया गया है। भारत के इतिहास में गुप्त युग को भारत का स्वर्ण-युग कहा गया है। आर्थिक क्षेत्र में जोखिम भरे कदम उठाये जाएंगे, छलांग लगाई जायेगी तो ही देश का सर्वांगीण विकास संभव हो पायेगा यह स्पष्ट करने वाला यह चित्र संविधान निर्माताओं की मनीषा को स्पष्ट करता है।


लेखक लक्ष्मीनारायण भाला द्वारा लिखित लेखो पर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा "हमारा संविधान : भाव एवं रेखांकन" पुस्तक का प्रकाशन किया है।