चित्रांकित है संविधान निर्माताओं के सपनों का भारत-6


लक्ष्मीनारायण भाला


संविधान के भाग 9 को 9(क) तक विस्तारित किया गया है। ऐसा विस्तार इससे पूर्व 4 एवं 4(क) तथा बाद में 14 एवं 14 (क) में देखा गया है। यही कारण है कि संविधान के भाग भले ही 22 हो परन्तु तीन भागों के क- विस्तार के कारण संविधान 22 के स्थान पर (22.3) 25 भागों में विभाजित किये जाने की बात भी कही जाती है। भाग 9 एवं 9 (क) की एक विशेषता यह भी है कि केवल एक ही धारा इन दोनों भागों में व्याप्त है। धारा 243 को 33 उपशीर्षकों में विस्तारित किया गया है। पंचायत एवं नगरपालिकायें उनका गठन, संरचना, अवधि, उनकी शक्ति तथा प्राधिकार, वित्तीय व्यवस्था, निर्वाचन तथा निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन आदि बातों के लिए आवश्यक नीति-नियम इस भाग एवं धारा के मूल विषय हैं।


इस भाग के प्रारंभ में गुप्तवंश के शासक विक्रमादित्य के दरबार का दृश्य एवं अंत में उस युग की एक मुहर चित्रांकित है। जो भारतीय इतिहास के स्वर्णकाल का द्योतक है। दरबार के दृश्य में सिंहासन पर विराजमान विक्रमादित्य एवं उनके दरबारियों के अतिरिक्त नृत्यांगना तथा वादक वृन्द परिलक्षित हो रहे हैं। मुहर पर धनुषधारी सैनिक अंकित है। विक्रम संवत की कालगणना ईसवी सन् से 57 वर्ष पूर्व ही प्रारंभ हो चुकी थी। नेपाल के लिच्छवी वंश के प्रथम राजा धर्मपाल भूमिवर्मा विक्रमादित्य ने इस काल गणना का चलन प्रारंभ किया था। 12 मास एवं 7 दिनों का क्रम निर्धारण भी उसी समय किया गया। न्याय परायण, नीति परायण, कला निपुण एवं संवेदनशीलता के कारण विक्रमादित्य यह नाम गौरवान्वित करने वाला नाम बन गया था। कालान्तर में मगध एवं उज्जैन राजा भी विक्रमादित्य नाम से गौरवान्वित हुए। ईसवीं पूर्व से प्रारंभ हुई यह परंपरा ईसवीं की तीसरी शताब्दी तक चलती रहीं। उज्जैन के दरबार की न्याय परायणता के कई उदाहरण ग्यारहवीं शताब्दी में लिपिबद्ध होने के प्रमाण पाये जाते हैं। आयुर्वेद तथा संस्कृत के प्रथम आचार्य क्रमश: धन्वंतरी तथा कालिदास विक्रमादित्य के ही दरबार के नौ रत्नों में से दो रत्न थे। बत्तीस विभागों या विधाओं में मिलने वाले न्याय का पंचायत स्तर तक विकेन्द्रीकरण किया गया था। विक्रमादित्य द्वारा स्थापित की गई यह व्यवस्था इतनी सुचारू थी कि उस सिंहासन पर बैठने वाला न्याय परायण ही होगा, इसमें किसी भी प्रकार के संदेह का कोई कारण नहीं रहता था। पंचायत स्तर तक ऐसी ही व्यवस्था स्वाधीन भारत में भी होनी चाहिए यहीं इस चित्र का संदेश है।


संविधान के भाग 10 में भी एक ही धारा 244 को 244 (क) में विस्तारित कर समाविष्ट किया गया है। अनुसूचित क्षेत्रों एवं जनजाति क्षेत्रों का प्रशासन इस धारा का मूल विषय है। इस भाग के प्रारंभ में प्रख्यात नालंदा विश्वविद्यालय के प्रशासन की मुहर चित्रांकित है एवं अंत में इसी विश्वविद्यालय के विशाल भवनों को चित्रांकित कर उसमें होने वाली शिक्षा, साधना एवं संस्कारों को स्पष्ट करने वाला परिदृश्य उपस्थित किया गया है। सातवीं शती में 10,000 से अधिक छात्रों को 1500 से अधिक आचार्यों के सानिध्य में शिक्षा व संस्कार देने वाला यह विश्व का सबसे बड़ा शिक्षा केन्द्र था। मोहम्मद खिलजी ने आक्रमण कर उसे तहस-नहस तो किया ही, निर्ममता पूर्वक छात्रों एवं आचार्यो को खदेडक़र पुस्तकालयों को आग भी लगा दी।


यही वह दुर्भाग्यपूर्ण कालखंड था जब भारत हतप्रभ तथा किंकर्तव्यविमूढ़ होने लगा था। कोई समाज इतना निर्मम, संवेदनहीन एवं पाशविक हो सकता है, यह भारत के सुसम्पन्न, सुसंस्कृत एवं शिक्षित समाज ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। इस अकल्पनीय स्थिति से कैसे निपटा जाये? यह यक्ष प्रश्न भारत के सामने तब से लेकर आज तक मुँह बाये खड़ा है। चित्रांकित दृश्य के समान शिक्षा के लिये अनुकूल वातावरण, शास्त्रार्थ की परंपरा एवं गुरु-शिष्य के सानिध्य का अवसर प्रदान करने वाली श्रेष्ठ व्यवस्था पुन: स्थापित हो यही संविधान निर्माताओं का स्वप्न था। वे यह चाहते थे कि नालंदा की रिक्तता को भरने की व्यवस्था की जाये। नालंदा अर्थात नालम् दा। नालम् का अर्थ है कमल, जो ज्ञान का प्रतीक है और दा का अर्थ है देने वाला। स्पष्ट है कि ज्ञान दान का यह श्रेष्ठ स्थान विश्वभर के लिये आकर्षण एवं प्रेरणा का केन्द्र था। ईसवी पूर्व 454 से 415 तक के कालखंड में स्थापित उस विशाल एवं श्रेष्ठ परिसर के समान कोई शिक्षा केन्द्र भारत में स्थापित हो, यही संविधान निर्माताओं की आकांक्षा थी।


भारत के दूर-दराज के अनुसूचित क्षेत्रों एवं जनजातियों तक शिक्षा की यह हवा पहुंचे, वह सबके लिये सुलभ हो, समाज का कोई भी तबका इससे वंचित न रह जाये यह संकल्पना संविधान के इस 10वें भाग का मूल लक्ष्य है। इस पर चिंतन-मनन हो, इसका क्रियान्वयन हो तथा समाज का पंचायती क्षेत्र एवं जनजाति क्षेत्र भी उससे लाभान्वित हो यही संविधान निर्माताओं की मनोकामना थी। संविधान को पवित्र ग्रंथ मानने वाले ‘हम भारत के लोग’ क्या उस मनोकामना को पूरा कर पायेंगे?


लेखक लक्ष्मीनारायण भाला द्वारा लिखित लेखो पर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा "हमारा संविधान : भाव एवं रेखांकन" पुस्तक का प्रकाशन किया है।