चित्रांकित है संविधान निर्माताओं के सपनों का भारत-1


लक्ष्मीनारायण भाला


भारत के संविधान की हस्तलिखित मूल प्रति की प्रतिलिपि हम देखेंगे तो मुखपृष्ठ से लेकर मल (अंतिम) पृष्ठ तक के हर पृष्ठ पर कलात्मक चौखट, उसमें आकर्षक लिखावट और हर भाग के प्रथम पृष्ठ पर एक या दो चित्रों से की गई सजावट मन को मोह लेती है। चित्र केवल मन को भाव विभोर ही नहीं करते वे तो मानों संविधान निर्माताओं की मनीषा को प्रकट कर रहे हो, ऐसा प्रतीत होता है। 22 भागों में 395 धाराओं को समेटे हुए आठ अनुसूचियों के साथ भारत के इस हस्तलिखित संविधान पर संविधान सभा के 281 सदस्यों के हस्ताक्षर अंकित हैं। संख्या की गिनती में एकाध संख्या का अंतर हो सकता है। यह कोई बड़ी बात नहीं है। परन्तु यह स्पष्ट है कि इसे बड़ी तन्मयता के साथ सजाया गया है।



कलात्मक लेखन में सिद्धहस्त उस समय के प्रख्यात हस्त लेखक प्रेम बिहारी नारायण रायजादा (सक्सेना) ने इसे पूरी लगन एवं अपनेपन की भावना से केवल कलात्मक ही नहीं, बल्कि भावनात्मक भी बना दिया है। सुप्रसिद्ध चित्रकार नंदलाल बोस एवं ब्योहर राममनोहर सिन्हा के नेतृत्व में शांतिनिकेतन, विश्वभारती (कोलकता) के चित्रकारों ने इसे चित्रों से सजाया है। चित्रों का चयन, क्रम निर्धारण तथा पुरातात्विक चित्रों को ‘फोटोलिथोग्राफी’ के सहारे कुछ पृष्ठों पर हस्तनिर्मित छापों के द्वारा छापने का काम देहरादून स्थित भारतीय सर्वेक्षण विभाग ने किया है। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद एवं पं.जवाहरलाल नेहरु से लेकर डॉ.हरेकृष्ण मेहताब एवं सुंदरलाल आदि महानुभावों के हस्ताक्षरों की सूची में पच्चीसवां हस्ताक्षर संविधान निर्माता के नाते जाने जाने वाले डॉ. भीमराव अम्बेडकर का है। संविधान में अशोक चिह्न से लेकर प्राकृतिक सौंदर्य तक कुल 28 चित्रों का उपयोग किया गया है। प्राय: 300 से अधिक कलात्मक चौखटों का इसमें उपयोग किया गया है।



शब्दों के अर्थों की एक सीमा होती है। चित्र असीम अर्थवाही होते हैं। उसी असीम का कुछ मात्रा में अर्थबोध हो सके तो संविधान निर्माताओं की भावनाओं तक हम भी पहुंच पायेंगे। संविधान निर्माताओं ने जिन बातों को शब्दों में प्रस्तुत करना था उनको तो हम पढ़ ही लेंगे परंतु जिन बातों को संकेत के रुप में चित्रांकित किया है उन्हें जानने एवं समझने का एक विनम्र प्रयास करते हुए यह लेखमाला प्रस्तुत की जा रही है।


अशोक चिह्न : भारत के राजकीय प्रतीक के रुप में जिसे संविधान सभा ने स्वीकार किया है वह मूलत: अपने पैरों के बल खड़े होकर चारों दिशाओं में देखने वाले चार सिंहों की मुखाकृति है। जिस आधारशिला पर ये शेर खड़े हैं उसके चारों ओर 24 सलाखों से युक्त चार चक्र हैं। इन धर्मचक्रों के बीचों बीच दौड़ता घोड़ा, चलने के लिये तत्पर नन्दी, अपने बल को दर्शाता हुआ हाथी एवं सतर्कता से खड़ा हुआ सिंह इस प्रकार की चार आकृतियां अंकित है। यह एक दिशा से देखने पर जितना एवं जिस रुप में दिखाई देगा उतना ही चित्रांकित होने के कारण एक चक्र एवं दोनों ओर दोनों चक्रों के किनारे दिखाई देते हैं। हाथी और सिंह तथा आधारशिला के नीचे घंटी के समान लटकता उलटा कमल पुष्प आंखों से ओझल है।



भारत के सर्वाधिक भूभाग पर राज्य करने वाले सम्राट अशोक ने अपने विजय चिह्न के नाते इस प्रतिमा को स्थान-स्थान पर स्थापित किया था। यह विजय सत्य की विजय के रुप में तत्कालीन भारतवासियों के लिये अभयदात्री थी। मुण्डकोउपनिषद् में वर्णित श्लोक ‘‘सत्यमेव जयते नाद्रिंतम सत्येन पंथा वितो देवयाना (3/1/6)’’ इस श्लोक से अंतिम विजय सत्य की ही होती है, यह भाव प्रकट होता है। उसी भाव को रेखांकित करने हेतु उसी श्लोक से ‘‘सत्यमेव जयते’’ यह अंश भारत के इस राजकीय चिह्न के नीचे देवनागरी लिपि में भारत के बोध वाक्य के रुप में लिखा गया है।



ईसा पूर्व 304 से 232 अर्थात 72 वर्ष चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा स्थापित एवं शासित अखंड भारत की तीसरी पीढ़ी के शासक थे अशोक। इसी कालखंड को भारत का स्वर्णयुग कहा जाता था। भारत सोने की चिडिय़ा कहलाती थी। पानी मांगने पर दूध पिलाया जाता था। यही कारण था कि भारत में दूध की नदियां बहती थी ऐसा कहा जाने लगा था। ज्ञान-विज्ञान, सम्पन्नता आदि का परमोत्कर्ष था। पराक्रम से अर्जित अपने इस राज्य का परित्याग कर अशोक ने त्याग एवं वैराग्य का भी उदाहरण प्रस्तुत किया था। पराक्रम एवं त्याग का समन्वय स्थापित करने वाले सम्राट अशोक को अपना आदर्श मानकर उसके पदचिह्नों पर चलने की प्रेरणा मिलती रहे यही सोच कर ‘‘अशोक चिह्न’’ को राजकीय चिह्न के नाते स्वीकार किया गया है। सारनाथ मंदिर में अशोक कालीन अवशेषों से प्राप्त यह अशोक चिह्न ‘‘हम भारत के लोगों’’ को प्रेरणा देने हेतु विजय चिह्न के रुप में देशभर में विजय स्तम्भों पर स्थापित किये गये हैं। पुन: एक बार भारत जगे, बढ़े एवं अपने ‘‘परम् वैभव’’ को प्राप्त करने हेतु आवश्यक पराक्रम करे। श्री अरविंद के कथनानुसार खंडित भारत एक दुर्घटना है तो अखंड भारत यही अपना सपना है। अशोक चिह्न उसी सपने को याद दिलाने वाला प्रतीक है। इस बात का विस्मरण न हो।


मोहनजोदड़ो की मोहर : ईस्वी पूर्व 2500 अर्थात प्राय: 4500 वर्ष पूर्व के अखंड भारत के सिंध प्रांत (अब पाकिस्तान) की तत्कालीन सांस्कृतिक राजधानी मोहनजोदड़ो थी। यहां पर शक्ति सम्पन्नता एवं कर्मठता का प्रतीक तथा महादेव शिव के वाहन नंदी को मोहर के रुप में स्वीकार किया गया था। इसी मोहर को संविधान के प्रथम भाग के शीर्ष पर अंकित किया गया है। भारत नवनिर्मित देश नहीं यह तो चिर पुरातन है। प्राय: 5000 वर्ष पूर्व की चीजें आज भी उपलब्ध हैं। जिस सिंध प्रांत में मोहनजोदड़ो अवस्थित हैं, वह राजनैतिक या प्रशासनिक दृष्टि से भले ही आज के भारत में न हो परंतु सांस्कृतिक दृष्टि से वह भारत का ही भूभाग था और रहेगा भी। यह संदेश स्थायी रुप से भारतियों को मिलता रहे एवं उसे पाने के लिए शक्ति-सम्पन्नता एवं कर्मठता में हम भारत के लोग उदासीन न हो जाए यही संविधान निर्माताओं का सपना था। प्रथम भाग के इस एकमात्र चित्र से प्राप्त यह संदेश मन-मस्तिष्क में बसा कर हम आगे बढ़ेंगे। हम भारत के लोग संविधान निर्माताओं की इस मनीषा को न भूले इसी अपेक्षा से यह मोहर प्रथम भाग पर लगाई गयी है।


लेखक लक्ष्मीनारायण भाला द्वारा लिखित लेखो पर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा "हमारा संविधान : भाव एवं रेखांकन" पुस्तक का प्रकाशन किया है।