चित्रांकित है संविधान निर्माताओं के सपनों का भारत-3


लक्ष्मीनारायण भाला


भारतीय संविधान के भाग 4 में राज्य की नीति के निदेशक तत्व, मूल कर्तव्य, संघ राज्य की कार्यपालिका, लोक प्रतिनिधियों की भूमिका, न्यायापालिका की भूमिका तथा देश के नियत्रंक तत्व के कर्तव्य आदि का उल्लेख है। इस भाग पर महाभारत काल का वह ऐतिहासिक प्रसंग चित्रांकित किया गया है जिसने दुनिया को गीता के रूप में एक अदभुत एवं सारगर्भ ग्रन्थ दिया है। हताशाग्रस्त अर्जुन को हताशा से उबारना कितना कठिन था यह बात गीता के निम्नलिखित विशलेषण से स्पष्ट होती है।



श्रेष्ठ धनुधारी, उत्कृष्ट योद्धा एवं सेनापति के गुरूभार को कंधे पर उठाने में सक्षम अर्जुन के साथ सारथी का दायित्व निभाने वाले श्रेष्ठतम नीति व्याख्याता, कुशल रणनीतिकार श्री कृष्ण रथ पर विराजमान हैं। रणभूमि सुसज्जित होकर, युद्ध की घोषणा करने वाले शंखनाद की प्रतीक्षा में स्तब्ध खड़ी है। ऐसे समय में अर्जुन अपने सारथी सखा कृष्ण से अपने मन के भाव प्रकट करते हुए कहते हैं कि हे! कृष्ण युद्ध प्रारंभ करने से पूर्व देख लिया जाए कि दोनों पक्षों की तैयारियां कितनी हैं?कौन-कौन युद्ध भूमि में युद्ध लडऩे आ चुके हैं?हमारी तैयारियां कैसी हैं? किसका किससे मुकाबला है? आदि-आदि। श्रीकृष्ण को पूरा भरोसा था कि युद्ध भूमि तो वीरों को उकसाती है, युद्ध के लिए प्रेरित करती है अत: अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करने का यह अच्छा अवसर है। फुर्ती के साथ रथ पूरी युद्ध भूमि में घुमाया गया। अपने निर्दिष्ट स्थान पर लौट आने के बाद श्रीकृष्ण शंख बजाकर युद्ध के लिए प्रस्तुत होने की घोषणा करने जा रहे थे कि अर्जुन ने उन्हें रोका। हे! कृष्ण, हे! सखा यह युद्ध किस लिए? अपनों को मारकर अपनों की लाशों पर खड़े होकर राज करना कौन-सा पौरुष है? युद्ध की विभिषिका से मैं हमारे अपनो को बचाना चाहता हूं। मुझे किसी राज-पाट की आवश्यकता नहीं है। अब तो मेरा शरीर भी शिथिल हुए जा रहा है। यह कह कर अर्जुन ने अपने शस्त्र रथ पर रख दिए। युद्ध भूमि पर वैराग्य, बिना युद्ध के आत्मसमर्पण, अब क्या होगा? कृष्ण स्वयं हतप्रभ हुए। उन्होंने घोड़ों की लगाम छोड़ दी। रथ को खड़ा कर अर्जुन की ओर तांकने लगे। अर्जुन तो आंखें झुका कर बैठा है। अब क्या होगा?



अठारह अध्याय तक विस्तारित हुई गीता के पहले अध्याय में कृष्ण का एक भी शब्द या वचन नहीं है। दूसरे अध्याय में सांख्य योग का सहारा लेकर उन्होंने युद्धभूमि पर निभाये जाने वाले कर्तव्य को समझाने का प्रयास किया। युद्ध के लिए सुसज्ज योद्धा को सांख्य योग ही प्रेरणा देने के लिए पर्याप्त था। परंतु अर्जुन पर कोई असर नहीं होता देख कृष्ण चकित थे। अर्जुन की हताशा चरम पर थी। युद्ध भूमि पर शस्त्र रखकर शास्त्र पर चर्चा करने का अनोखा दृश्य उपस्थित हो गया था। दोनों ओर की सेना के सभी योद्धा प्रतीक्षा कर रहे हैं शंखध्वनी की परंतु वहां तो हो रहा है दोनों का वार्तालाप तथा शास्त्रार्थ। एक अदभुत दृश्य।



इस प्रसंग को संविधान में भाग 4 पर अंकित करने का उद्देश्य स्पष्ट है, संकेत स्पष्ट हैं, संदेश भी स्पष्ट है। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद पूरे देश में कहीं खुशी, कहीं गम का वातावरण था। गम को खुशी में तब्दील करना जरूरी था। निराशा को आशा में, हताशा को प्रत्याशा में बदलना जरूरी था। देश को द्विधाग्रस्त मानसिकता से उबारना जरूरी था। यही काम युद्ध क्षेत्र में भगवान कृष्ण को करना पड़ा था। हताशाग्रस्त अर्जुन को अंतत: कर्म प्रवण होकर युद्ध करने के लिए प्रवृत्त करना, धर्म स्थापना में अपनी आकांक्षा के अनुरूप आचरण करने के लिए प्रेरित करना यही गीता के उपदेशों का अंतिम परिणाम उन्हें अपेक्षित था। वही हुआ भी। ‘कर्मण्येवाधि कारस्ते मा फलेषु कदाचन’। फल की आशा किए बिना कर्म करते रहो यह कहने वाले स्वयं कृष्ण ही अंतिम परिणाम पाने तक गीता का उपदेश अर्जुन को सुनाते रहे। ‘अब मेरा मोह नष्ट होकर मैं संदेहमुक्त हो चुका हूं अत: हे कृष्ण अब मैं वही करूंगा जो आप कहेंगे।’ इस प्रकार अर्जुन से आश्वासन पाने के बाद ही भगवान कृष्ण ने अपनी वाणी को विराम दिया।



संविधान के नीति निदेशक तत्व एवं मूल कर्तव्य वाले इस चतुर्थ भाग के प्रारंभ में इस चित्र के चयन का यही अर्थ है कि—‘यत्र योगेश्वर: कृष्ण यत्र पार्थो धनुर्धर: तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्रूवा नीतिर्मतिर्मम’ जहां नीति निर्धारक कृष्ण उपस्थित हों और जहां उसका पालन करने वाला पार्थ जैसा निपुण सेनापति उपस्थित हो वहां विजय निश्चित है। यही चतुर्थ भाग का निचोड़ अपेक्षित है। भारत को विजय प्राप्ति का लक्ष्य प्राप्त होने तक भारत के नेताओं को अपना कर्तव्य निष्ठा के साथ निभाना है अत: उनके लिए गीता के उपदेशों का स्मरण करते रहना जरूरी है। संविधान निर्माताओं के सपनों के भारत को पाना तभी संभव हो पाएगा।


लेखक लक्ष्मीनारायण भाला द्वारा लिखित लेखो पर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा "हमारा संविधान : भाव एवं रेखांकन" पुस्तक का प्रकाशन किया है।