चित्रांकित है संविधान निर्माताओं के सपनों का भारत-4


लक्ष्मीनारायण भाला


भारतीय संविधान के पाँचवें भाग में धारा 52 से लेकर धारा 151 तक कुल 100 धाराएँ समाहित है। कार्यपालिका, संसद, राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति की विधायी शक्तियाँ, न्यायपालिका तथा नियंत्रक महालेखा परीक्षक की भूमिका आदि प्रमुख अध्यायों से युक्त यह भाग वस्तुत: जनतंत्र के प्रमुख स्तंभों के कर्तव्यों को स्पष्ट करने वाला भाग है। संविधान के कुल 22 भागों में सर्वाधिक धाराओं वाला यह भाग केवल विस्तार के ही नहीं अपितु विषयवस्तु की गहराई की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।



गहन विषयों पर गहन चिंतन और मनन के लिये प्रथम प्रयोजन है, मन का शांत होना। यही कारण है कि संविधान निर्माताओं ने इस भाग के प्रारंभ में शांत मन से शांत परिवेश में शांति का संदेश देने वाले स्वयं भगवान बुद्ध को एक उपदेशक के रूप में चित्रांकित किया है। दो वृक्षों की संयुक्त छाया में, मनोरम प्रकृति के सानिध्य में, मृग-मयूरादि प्राणियों के साथ समरस होकर एकाग्र मन से गौतम-बुद्ध का संदेश सुनने वाले ज्ञान पिपासु अनुयायी इस चित्र में दिखायी देते है। कालखंड इसवीं पूर्व 563 से 483 तक का है।



वृहत्तर भारत के हिमालय की गोद में बसे हुए नेपाल के दक्षिणी भूभाग में लुम्बिनी नामक जनपद के निवासी शुद्धोधन के पुत्र सिद्धार्थ ही कालान्तर में गौतम बुद्ध कहलाये। कपिलवस्तु शाक्य गणराज्य की राजधानी थी। राजा शुद्धोधन के पुत्र को राजकुमार के समान ही पाला-पोसा जा रहा था। जन्मदात्री माँ सात दिन के पुत्र को छोडक़र परलोक सिधार गई अत: दूसरी रानी महाप्रजावती की छत्र-छाया में दास-दासी, नौकर-दायी आदि की देखभाल में सिद्धार्थ बड़े हुए। यथासमय विवाह हुआ। पत्नी यशोधरा को प्रथम संतान की प्राप्ति होने के बाद बालक का रोना-बिलखना आदि देखकर राजकुमार सिद्धार्थ को राजमहल से बाहर की दुनिया देखने की प्रबल इच्छा हुई। दो दूतों की सुरक्षा में राजकुमार सिद्धार्थ रथ में बैठकर भ्रमण के लिये निकले। लाठी टेककर लडख़ड़ाते हुए रास्ते चलते एक विकलांग को देखा, थोड़ी देर बाद खाँसते हुए वृद्ध अवस्था के एक रोगी को देखा, थोड़ा आगे बढ़े तो चार लोगों के कंधों पर सवार श्मशान की ओर जाती मृत-देह को देखा। 29 वर्ष की आयु में शिशु का रोना, युवा का विकलांग होना, वृद्धावस्था में अस्वस्थ होना तथा मृत्यु को प्राप्त होना इन चारों अवस्थाओं को एक ही दिन में देखकर विचलित मन से सिद्धार्थ राजमहल लौट आए। वैराग्य या विरक्ति का भाव प्रबल होने लगा। मन ने नश्वर संसार की मोह-माया से दूर होने की ठानी और दूसरे ही दिन अपनी पत्नी एवं बच्चे को रात में सोई हुई स्थिति में छोडक़र जीवन के रहस्य की खोज में सिद्धार्थ दक्षिण-पूर्व की ओर चल पड़े। गंगा के किनारे गया नगर में घने वृक्ष की छाया में ध्यानमग्न होने लगे। आठ वर्ष की कठिन साधना के बाद सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्ति हुई, अनुभूति हुई, बोध हुआ, और वही वृक्ष बोधि वृक्ष कहलाया। अन्तर्मन की यह अनुभूति एवं बोध जब शब्दों में प्रकट होने लगा तो सुनने वाले भाव-विभोर हो जाते। गौतम बुद्ध की वाणी भगवान की वाणी कहलाने लगी। गौतम बुद्ध, भगवान बुद्ध कहलाने लगे।



बुद्ध के इसी कालखंड के इर्द-गिर्द दो पीढिय़ों से पूर्व अर्थात इसवीं पूर्व 599 से 527 इस कालखंड में जिनका जन्म हुआ, वे भगवान महावीर, जैनमत के 24वें तीर्थंकर थे। जैन मान्यता के अनुसार 24 तीर्थंकरों की यह पाँचवी शृंृंखला है अत: मानवीय सभ्यता का यह पंचमकाल कहलाता है। षष्ठ काल के बाद संपूर्ण चराचर नये रूप में पुन: 24 तीर्थंकरों की इन छ: शृंखलाओं से होकर अपने उन्नत स्वरूप में आगे बढ़ेगा। निरंतरता को बनाये रखकर चलने वाली यह जीवनशैली ही सनातन है। इस निरंतरता में ऋतु परिवर्तन से हर्षित होकर आनंद-विभोर हो रहे मयूर को चित्रांकित कर यहाँ यही दर्शाया गया है कि हर परिवर्तन आनंददायी बने, सर्व स्वीकृत हो, सर्वमान्य बने। संविधान के अगले इस भाग 6 में भारत की राज्य रचना, राज्य की कार्यपालिका, विधान मंडल, राज्यपाल, उच्च न्यायालय, अधीनस्थ न्यायालय आदि के कर्तव्य एवं अधिकारों की व्याख्या की गई है।



संविधान के भाग 6 में भगवान महावीर को चित्रांकित करने के मूल में यही संकेत है कि 6 कालों के कालचक्र की सनातन प्रक्रिया को स्वीकार करते हुए हमें निरंतर आगे बढऩा है। धारा 152 से 237 तक अर्थात कुल 86 धाराओं को समाहित करने वाला यह भाग कर्तव्य पालन की दिशा निश्चित करने वाला भाग है। वस्तुत: जैनमत एवं बौद्धमत भारत की सांस्कृतिक परंपरा के ऐसे दो मत है जो मानवीय जीवन मूल्यों की रक्षा के लिये युगानुकूल परिवर्तन को स्वीकार तो करते हैं परंतु भारत की सनातन परंपरा को बनाये रखकर उसे बल देने मे मददगार बने रहने का भी भरोसा दिलाते हैं। भाग 5 एवं 6 इसी भरोसे को दृढ़ता देने में मददगार बनते हैं।



इस कालखंड की एक और विशेषता यह रही है कि भारत के एक भूभाग की शासन व्यवस्था नंद वंश द्वारा संचालित हो रही थी। शौर्य और पराक्रम के प्रति अति-विश्वास एवं अहंकार के कारण ऐश और आराम का जीवन जीने की लालसा शासक परिवार पर हावी होने लगी थी। राजधर्म और समाज धर्म, व्यक्तिगत अधिकार और सामाजिक कर्तव्य तथा सत्ता का उपयोग और उपभोग आदि विषयों में दुविधा बढ़ती हुई दिखाई देने लगी थी। संक्षिप्त में कहे तो यही था भारतीय इतिहास का सर्वाधिक असमंजस्य का कालखंड। एक ओर नंद वंश की उपभोग की मानसिकता तो दूसरी ओर चाणक्य की उपयोगी बने रहने की पराकाष्ठा के बीच उलझा भारत का यह महत्वपूर्ण कालखंड रहा है। संविधान निर्माताओं की मानसिकता के प्रतिविंब के रूप में इन दोनों चित्रों को देखें तो केन्द्र से लेकर राज्यों तक समाज जीवन को उन्नत एवं विकसित करने के लक्ष्य को ही यह प्रकट करता है। यह लक्ष्य प्राप्त करना हो तो युद्ध नहीं शांति, अनिश्चयता नहीं स्थिरता तथा उपभोगी नहीं उपयोगी बनने की मानसिकता आवश्यक है। दोनों चित्र इसी बात को प्रकट करते हुये प्रतीत होते है। महावीर और बुद्ध की छाया में अपने पुरुषार्थ एवं पराक्रम को देश व समाज हित में खपाने वाले शासक ही संविधान को गरिमा प्रदान कर सकेंगे, यही उनका संदेश है।


लेखक लक्ष्मीनारायण भाला द्वारा लिखित लेखो पर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा "हमारा संविधान : भाव एवं रेखांकन" पुस्तक का प्रकाशन किया है।