चित्रांकित है संविधान निर्माताओं के सपनों का भारत-8


लक्ष्मीनारायण भाला


संविधान का भाग तेरह (13) धारा 301 से लेकर 307 तक, कुल 8 धाराओं में सिमटा हुआ है। भारत के राज्य क्षेत्र के भीतर व्यापार-वाणिज्य एवं आंतरिक लेन-देन की नीतियों को स्पष्ट करने वाली इन आठ धाराओं में व्यापार-वाणिज्य एवं लेन-देन की स्वतंत्रता, केन्द्र व राज्य की विधायी शक्तियां, निर्बन्धन से निश्चित की गई सीमाएं, राज्यों के एकाधिकार का उपबंध निश्चित करने के नियम, पहली अनुसूची में सूचीबद्ध कुछ राज्यों की निर्बन्धन व अधिरोपण की शक्ति तथा धारा 301 से 304 तक के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिये प्राधिकारी के नियुक्ति की व्यवस्था आदि बातें इस भाग में समाहित हैं। स्पष्ट है कि देश के व्यापार-वाणिज्य की आदर्श स्थिति की कल्पना करते हुए उसे धरातल पर लाने का यह एक कठिन कार्य है। प्रयत्नों की पराकाष्ठा करने पर ही यह संभव हो पाएगा। यही कारण है कि संविधान के इस 13 वे भाग पर राजा भगीरथ द्वारा हुए गंगावतरण के प्रसंग को चित्रांकित किया गया है। भारत के उत्तरी छोर पर किये गए इस प्रयास का चित्रांकन भारत के दक्षिणी छोर पर तमिलनाडू स्थित महाबलीपुरम के चित्रकारों ने किया है। यह अपने आप में भारत की एकात्मता का संदेश देने वाली बात है। हम भारत के लोग ‘भगीरथ प्रयास’ इस कहावत से भली भांति परिचित हैं। किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिये प्रयत्नों की पराकाष्ठा का ही दूसरा नाम है ‘भगीरथ प्रयास’।


मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पूर्वज राजा सगर की राजधानी अयोध्या ही थी। पृथ्वीलोक में शुद्ध, पवित्र, उपजाऊ एवं टिकाऊ जल की नितांत आवश्यकता है, यह उन्हें प्रतीत होने लगा था। ऐसे सर्वगुणी जल का स्रोत देवलोक अर्थात देवतात्मा हिमालय की कोख में ही पाया जाएगा, यह बात वे जानते थे। इसीलिये उसकी खोज मे वे बार-बार हिमालय की ओर जाने लगे। अपने राज्य संचालन के साथ-साथ यह कार्य करना एक तपस्या ही थी। उनकी दो रानियों में एक वैदर्भीय कन्या केशिनी थी। उसे एक पुत्र था। अपने नाम के अनुसार ही वह असमंजस प्रवृत्ति का था। दूसरी रानी महती ने राज्य की 60 हजार की सेना को ही पुत्रवत स्नेह देकर सभी सैनिकों को पुत्र मान रखा था। अपने कार्यकाल में हुए अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर युद्धों में मारे गये इन पुत्रवत सैनिकों का तर्पण उसी देवलोकीय या स्वर्गीय जल से ही हो, यह उनकी इच्छा थी। यही कारण था कि इस जल की खोज ने एवं समतल भूमि पर उसे लाने की राजा सगर की इच्छा ने संकल्प का रूप ले लिया। अपने जीवन काल में वे इस संकल्प को पूरा नहीं कर पाये। सगर पुत्र असमंजस को ना तो राजकाज में और ना ही पवित्र जल की खोज में रुचि थी। उनकी इस कमी को उनके पुत्र अंशुमान ने पूरा करने का बीड़ा उठाया। अपने दादा का राज एवं उनके द्वारा की जा रही खोज को सम्हालते हुए उन्होंने भी हिमालय की यात्राएं की। अयोध्या को स्पर्श करते हुए बह रही सरयु के किनारे से होते हुए उसके उद््गम तक पहुंच कर कैलाश पर्वत की पवित्रता का उन्होंने अनुभव किया। वापिस लौट आए। अपने पुत्र दिलीप को राज गद्दी सौंपने के साथ पवित्र जल के लिये अब तक किये गये अपनें प्रयासों का राज भी उन्होंने राजा दिलीप को बताया। अपने पूर्वजों की इस साधना या तपस्या को राजा दिलीप ने भी उसी निष्ठा के साथ अपनाया।



कैलाश पर्वत पर स्थित मानसरोवर तक पहुंच कर उन्होंने देखा कि सरोवर से पश्चिम की ओर सतलुज और सिंधु तथा पूर्व की ओर ब्रह्मïपुत्र और कर्नाली बह रही है। यही कर्नाली कहीं घाघरा तो कहीं सरयु कहलाती है। उनके मन में एक विचार अनायास ही कौंधा। वे सोचने लगे कि बाहरी स्रोत से बहने वाली नदियों से भी अधिक शुद्ध, पवित्र, उपजाऊ और टिकाऊ जल सरोवर के भीतरी स्रोत से प्रवाहित होकर कहीं प्रकट होता हो तो वह छन कर निकला हुआ पवित्रतम एवं अमृततुल्य जल होगा। अपनी इस अनुभूति को अपना सुयोग्य पुत्र भगीरथ भी हृदयंगम करे, यह सोच कर उन्होंने भगीरथ को मानसरोवर तक आने की सूचना दी। पुत्र के आने पर अपनी अनुभूति उसे आत्मसात कराकर राजा दिलीप ने वहीं पर प्राण त्याग दिये।



विगत चार पीढिय़ों की तपस्या को आगे बढ़ाते हुए राजा भगीरथ ने मानसरोवर से निकलने वाले अंत:स्रोतों में समतल की दिशा में बहने वाले स्रोत को खोज निकाला। मानसरोवर से प्राय: 600 किलोमीटर की दूरी तक अंदर ही अंदर बह कर हिमालय की शिवालिक पर्वत शृंखला में गोमुख नामक एक दुर्गम पहाड़ी से होकर यह अंत:स्रोत बाहर आया। राजा भगीरथ उसी स्रोत के प्रवाह के साथ-साथ पहाडिय़ों से होते हुए समतल की ओर चलने लगे। कभी दौडक़र तो कभी रूकावट पैदा करने वाले टीले को तोडक़र उन्होंने उसे समतल की ओर बढऩे में सहायता की। यही कारण है कि इसे भागीरथी कहा जाने लगा। कालांतर में यही जाह्नवी कहलायी, गंगा भी कहलायी। राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को अर्थात अपनी सेना को मोक्ष प्रदान करने का कार्य इसी गंगाजल के तर्पण तथा कपिल मुनि के आशीर्वाद से सम्पन्न हुआ अत: इसे मोक्षदायिनी भी कहा जाने लगा।



पौराणिक महत्व के साथ ही गंगा का ऐतिहासिक महत्व भी कम नहीं है। गंगा तट अथवा गांगेय क्षेत्र में आगरा, कानपुर, प्रयाग, पटना, ढाका एवं कोलकाता आदि ऐसे स्थान हैै जो भारत के सामाजिक एवं राजनैतिक आंदोलनों के साक्षी रहे है। इसके धार्मिक महत्व को दर्शाने वाले तीर्थों की तो लम्बी तालिका बनेगी। पुण्यदायिनी होने के कारण इसका जल भारत में रहने वाले हर हिन्दु के घर में रखने की परंपरा चल पड़ी। भारत से बाहर भी गंगा जल साथ ले जाना एक पवित्रता का प्रतीक है। मॉरिशस में एक समय परी तालाब के नाम से जाने जाने वाले तालाब में भारत से गंगाजल की कुछ मात्रा डाल कर उसे गंगा तालाब बना दिया गया। अब वह एक प्रमुख तीर्थस्थान बन गया है। कृषिप्रधान देश भारत एवं बांग्लादेश के लिये गंगा की उपत्यकाएं धान, गन्ना, दाल, तिलहन, गेंहू आदि खाद्य पदार्थो के साथ सभी प्रकार के फल, कंदमूल, कपास, जूट आदि का उत्पादन करने वाले भूभाग के नाते ख्यात है। इसमें मिलने वाली नदियां एवं इससे निकली हुई नहरें गांगेय क्षेत्र को उपजाऊ बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।



कैलाश पर्वतमाला को भगवान शिव की जटा के रूप में देखते हुए गंगा को पाताललोक में समाविष्ट होने से बचाने के लिए मानसरोवर में अवतरित किया गया। उसे पर्वतमाला रूपी अपनी जटा में धारण करने के बाद गंगोत्री में प्रकट करने के लिये अंत:स्रोत से प्रवाहित किया गया। समाज में प्रचलित पौराणिक कहानी की यही वास्तविकता होगी, ऐसा हम भारत के लोग मानते हैं। मानव मात्र का भरण-पोषण करने के लिये अपने तटों की भूमि को उर्वरा करने वाली तथा आध्यात्म साधना के लिये मंगल परिवेश प्रदान करने वाली यह मातृस्वरूपा गंगा, भारत की आत्मा है।



संविधान निर्माताओं ने संविधान के भाग 13 को कार्यान्वित करने के लिये इसी प्रकार के भगीरथ प्रयास की आवश्यकता को रेखांकित करने वालेे इस चित्र का चयन किया है। हम भारतवासियों से यही अपेक्षा है कि भारत को आर्थिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से सक्षम बनाये रखने हेतु हम भी भगीरथ प्रयास करें। जिस प्रयास में निष्ठा एवं निरंतरता हो, वही प्रयास ‘भगीरथ प्रयास’ कहलाता है।


लेखक लक्ष्मीनारायण भाला द्वारा लिखित लेखो पर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा "हमारा संविधान : भाव एवं रेखांकन" पुस्तक का प्रकाशन किया है।