चित्रांकित है संविधान निर्माताओं के सपनों का भारत-7


लक्ष्मीनारायण भाला


केन्द्र सरकार एवं राज्यों के बीच संबंध, विधायी शक्तियों का वितरण, प्रशासनिक संबंध, राज्यों पर संघ (केन्द्र) का नियंत्रण, आपातकाल की घोषणा की जैसी स्थितियों, अंतरराज्यीय संबंधों को सुदृढ़ करने वाले विषय, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों एवं करारों को प्रभावी करने के लिए विधान, राज्यों को अधिक शक्ति देने के प्रावधान आदि कई बातों का सूक्ष्मता से विचार करने वाला भाग है, संविधान का 11वाँ भाग।


परंपरागत व्यवस्थाओं के अनुसार किसी शासक या राजा का आधिपत्य जब अन्य छोटे राजे-रजवाड़े भी स्वीकार करने लगते हैं तो उस राजा को यथासमय अश्वमेध यज्ञ का आयोजन कर अपने सार्वभौमित्व पर मुहर लगवानी पड़ती थी। इसी सार्वभौमित्व के आधार पर छोटे-छोटे राज्यों की स्वायत्तता एवं उनके अस्तित्व पर कोई आँच न आने पाये तथा उनका सुचारू संचालन होता रहे ऐसी व्यवस्था खड़ी करने वाला राजा ही सम्राट कहलाता था। अंग-बंग-कलिंग इन तीन बड़ी भौगोलिक ईकाईयों ने क्रमश: उत्तर भारत, पश्चिम-मध्य-पूर्व भारत तथा दक्षिण भारत को मिलाकर एक अखण्ड भारत की मान्यता दी थी। यही मान्यता इस संविधान में भी प्रकट हो, यही सोचकर संविधान निर्माताओं ने राज्य एवं केन्द्र के बीच होने वाले संबंधों को संविधान के पन्नों में अश्वमेध यज्ञ के प्रतीकात्मक चित्र के द्वारा स्पष्ट किया है।


स्वायत्तता एवं सार्वभौमिकता के अद्भुत मेल का ही नाम है अश्वमेध यज्ञ। अश्व अर्थात घोड़े को दिग्विजय की यात्रा पर ले जाता हुआ सम्राट एवं उसके आधिपत्य को स्वीकार करने की मानसिकता को दर्शाता हुआ शरणागत एक राजा, इस चित्र में अंकित है। भाग 11 के विषय को किस दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए, यह स्पष्ट करने वाला यह चित्र निस्संदेह संविधान निर्माताओं की मानसिकता को दर्शाने वाला श्रेष्ठ प्रतीक है।


संविधान के भाग 12 में वित्त, संपत्ति, संविदाएँ तथा वादों से संबंधित नीति-नियमों को स्पष्ट किया गया है। धारा 264 से 300 तक कुल 37 धाराओं को समाहित करने वाले इस भाग में वित्त आयोग के गठन से लेकर लोकलेखा, आकस्मिक निधि, केन्द्र एवं राज्यों के बीच राजस्वों का वितरण, अनुदान, वृत्तियों-व्यापारों-आजीविकाओं एवं नियोजनों पर कर, संपत्ति का अधिकार, उत्तराधिकार तथा उससे संबंधित वादों आदि बातों का बारीकी से विश्लेषण किया गया है।


संविधान के इस भाग के प्रारंभ में एक स्वस्तिक चिह्न तथा नटराज का चिह्न अंकित है। स्वस्तिक अर्थात (सु+अस्ति+क) अर्थात शुभ होने का विश्वास दिलाने वाला एक प्रतीक। भारत में वैदिक काल से चली आ रही परम्परा में स्वस्तिक अत्यन्त पवित्र तथा मंगलकारी चिह्न माना जाता रहा है। छ: रेखाओं एवं चार बिन्दुओं से निर्मित यह चिह्न हर कार्य के प्रारंभ में रोली या कुमकुम से अंकित करना शुभ माना जाता है। दो रेखाओं से निर्मित जमा (+) चिह्न के हर सिरे पर घड़ी की सुईयों की दिशा में जाने वाली रेखा खींचकर बनी हुई आकृति में चार बिन्दियाँ अंकित करने के बाद जो चिह्न बनेगा वही स्वस्तिक का परिपूर्ण रूप है। संविधान में अंकित यह चिह्न संभवत: सावधानीपूर्वक नहीं आँका गया। उसकी बाहरी चार रेखायें दक्षिणगामी न होकर वामगामी हो गई। चिह्न उल्टा अंकित हो गया। संयोगवश आकृति में चार बिन्दियाँ भी अंकित नहीं है। उल्लेखनीय है कि हिटलर ने स्वास्तिक के इसी उल्टे चिह्न को अपना प्रतीक माना था। विद्वानों का यही मानना है कि शुभ चिह्न को उल्टा कर दें तो वह अशुभ-लक्षणी बन जाता है। हिटलर के साथ वही हुआ। संविधान निर्माताओं की असावधानी को दूर करने के लिए आवश्यक संशोधन लाकर इस स्वस्तिक चिह्न को उसके मूल स्वरूप में रखना आवश्यक है ऐसा विद्वानों का मानना है। यह असंभव भी नहीं है। आर्थिक क्रान्ति के इस दौर में विश्व को नेतृत्व करने की भारत की संभावना को देखते हुए यह कर लेना ही उचित होगा।


अर्थ ही अनर्थ का मूल है परन्तु वही अर्थ सही मार्ग से अर्जित कर सही कार्य में व्यय किया जाये तो सार्थक हो जाता है। वह हर्षदाता तथा सुखदाता बन जाता है। हर्षित मन आनन्दमग्न होकर नृत्य करने लगता है। संविधान के 12वें भाग के प्रारंभ में नटराज का चित्र उसी हर्ष को दर्शाता है। आर्थिक शुचिता मन में सकारात्मक एवं रचनात्मक भाव जगाकर उसे कलात्मक बना देती है। नृत्य सभी कलाओं में श्रेष्ठ है तथा कलाओं का राजा कहलाता है। वही कला देवाधि देव महादेव के द्वारा प्रकट हो रही हो तो उसकी श्रेष्ठता भी असीम हो जाती है। नटराज को महादेव का ही अवतार माना गया है। अत: नटराज का यह प्रतीक उसी श्रेष्ठता को प्रदर्शित करता है। संविधान निर्माताओं द्वारा इस चित्र के चयन के मूल में उनके सोच की यही श्रेष्ठता परिलक्षित होती है।


लेखक लक्ष्मीनारायण भाला द्वारा लिखित लेखो पर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा "हमारा संविधान : भाव एवं रेखांकन" पुस्तक का प्रकाशन किया है।