चित्रांकित है संविधान निर्माताओं के सपनों का भारत-2


लक्ष्मीनारायण भाला


अपनी चतुराई के बलबुते अपनी साम्राज्यवादी मानसिकता को पोषित करने वाले अंग्रेजों ने भारत पर भी अपना साम्राज्य थोप रखा था। कई मायनों में अवैज्ञानिक एवं अपरिपूर्ण होते हुए भी उनकी भाषा एवं कालगणना वैश्विक मान्यता प्राप्त होने के भ्रम पर स्वीकृति का आवरण बनाए रखने में सफल रही हैं। परिस्थितिवश भारत के संविधान ने उसी भाषा एवं कालगणना को स्वीकार किया। संविधान पर द्विविधा ग्रस्त मानसिकता की छाया छाई रही। प्रथम भाग के प्रथम अनुच्छेद या धारा (1) में अपने देश का नाम निर्धारित करने में ही उसका प्रकटीकरण हुआ और हमें अपने देश के नाम को भी ‘इण्डिया दैट इज भारत’ के रूप में स्वीकार करना पड़ा। इस द्विविधा से मुक्त होने के प्रयास के रूप में हम चित्रों के चयन को देखें तो संविधान निर्माताओं के सपनों का भारत हमें स्पष्ट दिखाई देगा। प्रथम चार अनुच्छेदों को समाहित करने वाले प्रथम भाग में मोहनजोदारो की मोहर को शीर्ष पर अंकित कर उन्होंने आने वाली पीढ़ी पर उस सपने को साकार करने का भार सौप दिया है, यह कहे तो अतिशयोक्ति नही होगी ।



इस सपने को साकार करना हो तो भारत को जानना जरूरी है। भाग 2 से भाग 19 तक अर्थात कुल 18 भागों के लिये चयनित चित्र वैदिक काल से लेकर आज तक के भारत का परिचय हमें कराते हैं। काल की क्रमबद्धता एवं संविधान के भागों के विषयों के साथ उसकी प्रासंगिकता को जिस बुद्धिमानी से जोड़ा गया है वह चयनकर्ता की गहन अनुभूति का ही परिणाम है। ऐसे चयनकर्ताओं के समूह को सामुहिक नमन कर हम आगे बढते है। भाग 2 का प्रारम्भ वैदिक काल के एक चित्र के द्वारा होता है। वैदिक काल के किसी आश्रम के साथ संचालित किये जा रहे गुरुकूल का यह चित्र है। प्राकृतिक सम्पन्नता से परिपूर्ण परिवेश। चारों ओर हरियाली। निसर्ग से तालमेल बनाए रख कर निर्माण किए गए घर और रास्ते। सृष्टि निर्माता परमात्मा के प्रति श्रद्धा ज्ञापन करने के लिए स्थापित मन्दिर। प्रकृति के रहस्य के साथ जीवन के रहस्य को जानने की आतुरता निर्माण करने में दक्षता प्राप्त गुरु एवं उसे जानने के लिए आतुर विद्यार्थी। एक आदर्श गुरुकूल।



संविधान के इस भाग का मूल विषय है, नागरिकता। योग्य नागरिक ही नागरिकता की गरिमा को बनाए रख सकता है। योग्य नागरिक बनने के लिये सर्वप्रथम योग्य शिक्षा एवं योग्य संस्कार पाना आवश्यक है। वैदिक काल की गुरुकुल प्रणाली शिक्षा एवं संस्कार पाने की परखी हुई, प्रमाणित एवं प्रभावी कार्यप्रणाली है। इस चित्र के चयन का अन्तर्निहित भाव यही है की भारत को अपनी शिक्षा व्यवस्था अपनी परखी हुई प्रणाली के द्वारा ही परिचालित करनी चाहिए। मनुष्य निर्माण करने वाली शिक्षा ही देश निर्माण में सहायक होगी। आज भी शिक्षा के उस स्वरूप को आधुनिक परिवेश मे पाने एवं ढालने के लिये हम प्रयासरत है। सफलता की आशा धुमिल नहीं होगी यह भी विश्वास है।



मुगलों द्वारा तहस-नहस की गई तथा अंग्रेजों द्वारा आरोपित की गई शिक्षा के कारण हमारा समाज आत्मग्लानी से ग्रस्त है। कई पीढिय़ों से जड़ जमाये बैठी इस अभारतीय शिक्षा प्रणाली के आमूल परिवर्तन की प्रक्रिया की गति बढ़ेगी तो लक्ष्य प्राप्ति की दूरी घटेगी। इस गति को बढ़ाना आवश्यक है। यही संदेश संविधान के भाग दो की 5 से 11 धाराएँ हमें देती है।


 


भाग 3, अनुच्छेद 12 से 35 अर्थात 24 धाराओं से परिपूर्ण है। मूल अधिकार अथवा मौलिक अधिकार इन धाराओं का मुख्य विषय है। संविधान की उद्देशिका में स्पष्ट रूप से कहा गया है की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा एवं अवसर की समानता आदि के अधिकार ही मौलिक अधिकार के अन्तर्गत आते है। अहंकारी बनकर अन्याय करने वाला शासक मौलिक अधिकारों की परवाह नही करता अत: उसकी रक्षा भी नही कर सकता। परिणामत: वह अधिकारों का हनन ही करता है। यही कारण था की श्रीराम ने अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान बाली का वध कर सुग्रीव को राजपाट सौंपा। रावण का वध कर विभिषण को राजपाट सौंपा। अन्तत: अपने पूर्व निर्धारित राज्य का अधिकार पाकर श्री राम ने अपना कर्तव्य निभाने की भावना से अयोध्या की ओर प्रस्थान किया।



श्रीराम का पुष्पक विमान से सीता एवं लक्ष्मण के साथ अयोध्या की ओर जाते हुये का रेखा चित्र संविधान के भाग 3 के प्रारम्भ में दिया गया है। सत्ता पाकर अहंकारी होने के विपरीत 14 वर्ष तक सत्ता मे रह कर भी सत्ता के प्रति मोह न होने का विश्वास दिलाने वाले भाई भरत के पास उसी विश्वास के साथ भाई राम का जाना एक आदर्श एवं अद्भुत घटना है। एक दूसरे के प्रति यह विश्वास ही रामराज्य की ऊँचाई की मजबूत नींव है। रामराज्य भारत की ही नहीं पूरे विश्ब की आदर्श शासन प्रणाली है। असत्य पर सत्य की विजय सुनिश्चित करने वाले राम ही भारत की आत्मा है।



संविधान के भाग 3 पर इस चित्र का होना संविधान निर्माताओं के मन की इसी बात का द्योतक है कि उन्हें भारत में रामराज्य की पून: प्रतिष्ठा की कामना है। भारत की आत्मा जागृत हो यही उनका सपना है। इस सपने को साकार करने की प्रेरणा देने वाले इस चित्र को शत बार नमन।


लेखक लक्ष्मीनारायण भाला द्वारा लिखित लेखो पर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा "हमारा संविधान : भाव एवं रेखांकन" पुस्तक का प्रकाशन किया है।