खौफ बनाए रखने के लिए नक्सली सप्ताह

गुलाब बत्रा
                                                
जयपुर। केंद्र अथवा राज्य सरकारों द्वारा अपनी योजनाओं तथा कार्यक्रमों के प्रचार प्रसार के लिए सप्ताह एवं पखवाड़ा मनाया जाता है लेकिन नक्सलवाद समर्थक भी अपने इलाके में दबदबा बनाए रखने की  गरज से नक्सली सप्ताह का आयोजन करने लगे है।
राजधानी जयपुर में संपन्न 12वें आदिवासी युवा आदान-प्रदान कार्यक्रम में महाराष्ट्र के गढ़चिरौली इलाके से आई एक छात्रा ने बातचीत में इस तथ्य का खुलासा किया, सात दिवसीय शिविर का आयोजन नेहरू युवा केंद्र राजस्थान तथा युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय भारत सरकार के तत्वाधान में सुरेश ज्ञान विहार विश्वविद्यालय जगतपुरा में किया गया था।
12वीं कक्षा की इस छात्रा के अनुसार नक्सली सप्ताह मनाया गया। ऐसा हर साल होता है। इस दौरान पूरे इलाके में बंद रहता है। बसों इत्यादि का आवागमन नहीं होता । जगह-जगह पर नक्सली सप्ताह के बैनर लगाए जाते हैं। और छितरी आबादी के अनुसार सभाएं की जाती है। इन सभाओं में लोगों को नक्सलियों का साथ देने की हिदायत दी जाती है। पुलिस तथा सुरक्षा बल के खिलाफ भड़काया जाता है। नक्सलियों का खौफ इतना होता है कि आदिवासियों की बगैर उतारना तो दूर उन्हें छूने तक की हिम्मत नहीं होती। भारी संख्या में पुलिस बल इन बैनरो को अपने कब्जे में लेते हैं। सप्ताह के दौरान जगह-जगह पेड़ काटकर रास्तों को अवरुद्ध कर दिया जाता है। आम जनजीवन ठप हो जाता है। हाल ही में मनाए गए नक्सली सप्ताह में गत 2 दिसंबर को कमलापुर इलाके के आशा गांव में एक पर्यटन केंद्र को नक्सलियों ने तहस-नहस कर दिया। वन विभाग ने गांव में आशा तालाब को पर्यटकों के लिए विकसित किया था। वहीं बनाए गए हाथी कैंप को भी ध्वस्त कर दिया गया। यह कार्यवाही सुरक्षा बलों तथा पुलिस द्वारा लगभग 44 नक्सलियों को मारे जाने के विरोध में की गई थी।
गढचिरोली इलाके में 2010 में नक्सलियों के विस्फोट से कई पुलिसकर्मी मारे गए थे। यह विस्फोट स्कूल से कुछ दूरी पर किया गया था। नक्सली पूरी योजना बनाकर विस्पोट करते हैं। इस छात्रा के अनुसार 2-2 नक्सली गांव में  पहुंचकर पागलों जैसी हरकतें करते हुए लोगों की बातें सुन समझ कर अपने आकाओं को सूचना देते हैं।
गांव में 12वी तक स्कूल है। आगे पढ़ाई के लिए 35 किलोमीटर दूर अहैरी तहसील जाना पड़ता है इसलिए मां-बाप लड़कियों को आगे नहीं पढ़ाते हैं। गांव में पर्याप्त चिकित्सा सुविधा नहीं है। डॉक्टर मनमर्जी से आते हैं। दवाई भी नहीं मिलती। सड़कों की हालत खराब है । गंभीर रोगी की बड़े अस्पताल ले जाते समय मौत हो जाती है। बिजली का हाल बेहाल है ।बरसात में तो बिजली प्रायः ठप रहती है। ग्रामीण धान, कपास ,सोयाबीन की खेती करते हैं। कुओं से सिंचाई तथा पेयजल का सहारा है। पिछली विधानसभा चुनाव के समय क्षतिग्रस्त पाइप लाइन ठीक करने के वायदे किए गए थे लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ। ग्रामीण भगवान भरोसे गुजारा करने को मजबूर है।