राजस्थानी भाषा के भीष्म पितामह के रूप में याद किये जाते हैं स्व. मुरलीधर व्यास “राजस्थानी"

श्याम शर्मा 


राजस्थानी भाषा की जब भी चर्चा होती है तो बीकानेर के विद्वान स्व. मुरलीधर व्यास का नाम प्रमुखता से लिया जाता है और लिया जाता रहेगा। राजस्थानी भाषा के अमर साधक स्व. मुरलीधर व्यास ने राजस्थानी की विभिन्न विधाओं में तब लिखना शुरू कर दिया था जब राजस्थानी साहित्य इतना परिपक्व ही नहीं हुआ था और लिखने वालों की संख्या अंगुलियों पर गिनने जितनी थी।


राजस्थानी में अनेक विद्वान हुए हैं और नये लेखक भी अपनी कलम से इस भाषा को पोषित पल्लवित कर रहे हैं लेकिन भाषा के लिए समर्पित स्व. मुरलीधरजी जैसा कोई नहीं हुआइसीलिये उन्हें राजस्थानी भाषा का भीष्म पितामह कहा जाता है।


 मुरलीधर जी ने अपने नाम के आगे 'राजस्थानी' उपनाम लगाया, इसके पीछे रोचक घटना है। बात वर्ष 1930 की हैरियासत काल में बीकानेर के साहित्यकार गुण प्रकाशक सज्जनालय और नागरी भंडार में एकत्र होकर साहित्यिक गोष्ठियां किया करते थे और समकालीन साहित्य पर चर्चा कर एक दूसरे की जानकारी का आदान-प्रदान किया करते थे। इनमें ज्यादातर राजस्थानी भाषा के हिमायती होते थे।


एक बार राजस्थानी विद्वान नरोत्तम दास स्वामी ने भावुक होकर कहा था कि हमारी मायड़ भाषा का हमारे घर में ही सम्मान नहीं है तो बाहर इस भाषा को कैसे सम्मान मिलेगा? लोग राजस्थानी को भाषा ही मानने को तैयार नहीं है। इस पर मुरलीधर जी ने उनके सामने ही संकल्प लिया कि वे अब राजस्थानी भाषा के उत्थान के लिए ही काम करेंगे। उन्होंने उसी समय यह संकल्प भी व्यक्त किया कि वे अब मुरलीधर व्यास राजस्थानी के नाम से लिखेंगे और राजस्थानी में ही बोलेंगे।


उस गोष्ठी में मौजूद सभी साहित्यकारों ने मुरलीधरजी के इस संकल्प की सराहना की क्योंकि वे जानते थे कि व्यास की लेखनी में जो मिठास और अपनापन है उससे राजस्थानी भाषा को बल मिलेगा। इसके बाद उन्होंने जब भी अपनी कलम चलाई तो उससे राजस्थानी भाषा में ही लिखा। घर में या बाहर किसी से बात भी की तो उससे राजस्थानी के ही बोल निकलते थे। 


ऐसा नहीं है कि वे साहित्य की रचना में ही राजस्थानी भाषा का इस्तेमाल करते थे बल्कि वे अपने छोटे-मोटे यादगार स्वरूप लिखे जाने वाले विवरण भी राजस्थानी में लिखते थेयही संस्कार उन्होंने उस समय के लेखकों को दिए जिससे कई राजस्थानी के नये लेखक पैदा हुए जिन्होंने राजस्थानी भाषा को आगे बढ़ाया। सरकारी सेवा से निवृत्त होने के बाद सादुल रिसर्च इंस्टीट्यूट में सेवाएं देते हुए उन्होंने राजस्थानी शोध पत्रिका "राजस्थानी भारती" आरम्भ की जिससे राजस्थानी भाषा के विकास को महत्वपूर्ण बल मिला। उन्होंने दो खंडों में राजस्थानी मुहावरों का संकलन कर उनके गुण अर्थों की ऐसी व्याख्या की जिससे आम आदमी भी उसे आसानी से समझ सकता है।


उनका मानना था कि राजस्थानी एक सशक्त भाषा है। इसमें जो शब्द सामर्थ्य है वह और किसी भाषा में नहीं हैराजस्थानी भाषा में व्यंग्य लेखन की शुरुआत सही मायने में स्व. व्यास जी ने ही की थी। उनकी "इक्केवाला' एक ऐसी व्यंग्य रचना है जिसे आज भी पढ़ने में उतना ही आनन्द आता हैराजस्थानी भाषा में प्रकाशित उनके कहानी संग्रह 'वर्षगांठ' राजस्थानी साहित्य में मील का पत्थर है।


बंगाल के भाषाविद सुनीति कुमार चटर्जी ने मुरलीधर व्यास के राजस्थानी साहित्य की तुलना शरतचंद्र चट्टोपाध्याय से की थी और उन्हें शरत बाबू का भाव शिष्य बताया था। एक बार हिन्दी और उर्दू के सशक्त कवि शीन काफ निजाम ने भी बातचीत में कहा था कि राजस्थानी भाषा कम शब्दों में अधिक से अधिक सम्प्रेषण की क्षमता रखती है। राजस्थानी की कहावतें और मुहावरे अपने अन्दर पूरी कहानी समेटे हुए रहते हैं।


राजस्थानी के अमर साधक -


मुरलीधर व्यास का जन्म बीकानेर में पुष्करणा ब्राहमण समाज में श्री हरनारायण व्यास लालाणी की धर्मपत्नी श्रीमती लीलादेवी की कोख से 10 अप्रैल 1898 को हुआ था। उन्होंने वैसे तो 1915 में लिखना शुरू कर दिया था और उनकी पहली कहानी मित्र' 1916-17 में साहित्यिक पत्रिका 'गल्प भारती' में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद उन्होंने राजस्थानी की सभी विधाओं में लिखना शुरू किया और कहानी, कहावतें और व्यंग्य के साथ रेखाचित्र पर भी अपनी कलम चलाई।


स्व. व्यास को राजस्थानी भाषा के पहले कहानीकार के रूप में आज भी श्रद्धा से याद किया जाता है। भारतीय साहित्य अकादमी दिल्ली ने वर्ष 2009 में भारतीय साहित्य के निर्माता श्रृंखला निकाली जिसमें राजस्थानी भाषा में उनके सर्वश्रेष्ठ योगदान पर श्री मुरलीधर व्यास पर मोनोग्राफ प्रकाशित करवायाराजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी की ओर से उनके नाम से मुरलीधर व्यास कथा पुरस्कार प्रति वर्ष दिया जा रहा है। इस पुरस्कार की राशि 51 हजार रुपये है।


मुरलीधर जी के पुत्र श्री ललित आजाद भी कलम के धनी थे और उन्होंने कलम नाम से अखबार निकाला जो प्रदेश में चर्चित रहा। उन्होंने गणराज्य में भी अपनी तीखी लेखनी से प्रदेश के लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कियावे उस समय के मुख्यमंत्री स्व. मोहनलाल सुखाड़िया के नजदीकी लोगों में गिने जाते थे।


स्व. मुरलीधर व्यास के पौत्र स्व. किशन कुमार आजाद को लिखने के संस्कार अपने दादा से विरासत में मिले थे। उनके बीच में रामकृष्ण परमहंस और विवेकानन्द जैसे गुरु-शिष्य समान सम्बन्ध थे। दादा का अपने पौत्र पर अत्यधिक स्नेह था और यही संस्कार किशन कुमार आजाद को इस क्षेत्र में अपने परिवार की प्रतिष्ठा बढ़ाने में प्रेरणा का स्रोत बना। यही वजह रही कि किशन कुमार के मन में किसी भगवान की प्रतिमूर्ति के रूप में अपने दादा का ही अक्स उभरता थावे हर दिन भगवान के सामने हाथ जोड़ने से पहले अपने दादा के चित्र के आगे नमन कर घर से निकलते थे।


मान्यता मिले तो ही सच्ची श्रद्धांजलि


राजस्थानी भाषा की ताकत का इसी बात से अंदाज लगाया जा सकता है कि संवैधानिक मान्यता नहीं मिलने के बावजूद आज की राजस्थानी कहानी अपनी समृद्ध परम्पराओं से ऊर्जा ग्रहण करते हुए भारतीय ही नहीं विश्व की भाषाओं में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए हैं। राजस्थान के गांधीवादी मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत भी राजस्थानी को मान्यता देने के पक्षधर हैं। उन्होंने वर्ष 2003 में अपने कार्यकाल में विधानसभा में राजस्थानी भाषा को मान्यता देने का संकल्प पारित कर केन्द्र सरकार के पास भिजवाया था लेकिन केन्द्र सरकार अभी तक उस पर कोई निर्णय नहीं ले पाई है।


राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने के स्व. व्यास के संकल्प को पूरा करने के लिए राजस्थानी लेखकों का प्रयास जिस दिन सफल होगा उसी दिन उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित होगी। श्रद्धा के स्वरों में ये दो लाइनें यहां मौजूं लगती है - दिग्दिगन्त में गूंज रही है, तेरी मुरली हे मुरलीधर!