डॉक्टर जी का जीवन सन्देश

परमपूजनीय डॉक्टरजी के कष्टपूर्ण, परिश्रमी एवं कर्मठ जीवन से सर्वसाधारण व्यक्ति को एक आशादायी सन्देश मिलता है। दरिद्रता, प्रसिद्धिविहीनता, बड़ों की उदासीनता, परिस्थिति की प्रतिकूलता, पग-पग पर बाधाएँ, विरोध, उपेक्षा, उपहास आदि के कटु अनुभव के साथ-साथ स्वीकृत कार्य की पूर्ति के लिए आवश्यक साधनों का अत्यन्त अभाव आदि कितनी ही कठिनाइयाँ मार्ग में आयें तो भी अपने कार्य के साथ तन्मय होकर ‘मुक्तसंगोऽनहंवादी.....’ इस वृत्ति से सुख-दुख, मानापमान, यशापयश आदि किसी की भी चिन्ता न करते हुए यदि कोई प्रयत्नरत रहेगा तो उसे अवश्य ही सफलता मिलेगी।’’ डॉक्टरजी के छोटे जीवनचिरत्र के आरम्भ में ‘‘क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां पकरणे’’ यह जो सुभाषित दिया है वह उनके ऊपर पूरी तरह घटता है; किंबहुना उनका सम्पूर्ण जीवन ही इस उक्ति का मूर्तिमन्त उदाहरण था। अपने घरबार के कामकाज में हताश होकर हाथ-पाँव छोड़ देनेवालों को, किसी भी सामाजिक कार्य को करते समय बाधाओं से घबड़ाकर निराशा से कार्यविमुख होनेवालों को, इस पवित्र जीवन से आशा का सन्देश प्राप्त होकर सदैव ही कार्यरत रहने की प्रेरणा मिल सकेगी।


ऐसे प्रेरणादायक जीवन के कतिपय प्रेरक गुणों एवं सिद्धान्तों को अपने जीवन में भी स्थान देना हितावह है इसलिए कुछ प्रमुख बातों का यहाँ उल्लेख करना लाभकारी होगा। उनका सर्वप्रथम उल्लेखनीय गुण है उनके मन में राष्ट्रविमोचन की, राष्ट्रोन्नति की उत्कट लगन। उनमें राष्ट्रभक्ति का यह भाव बाह्य परिस्थिति के कारण उत्पन्न नहीं हुआ था अपितु उनका अभिजात स्थायी स्वभाव ही था। बचपन से ही वह प्रकट होता था। तत्कालीन अंग्रेजी शासन की दासता के कारण एक विशिष्ट स्वरूप में उनकी राष्ट्रभक्ति का आविर्भाव होना अपरिहार्य ही था। किसी-न-किसी प्रकार विदेशी राज्य को देश से उखाड़ फेंकना चाहिए, उनकी यह इच्छा इसी उत्कट राष्ट्रभक्ति में से पैदा हुई थी। अन्तःकरण में निर्भय पौरुष का भाव होने के कारण सशस्त्र क्रान्ति की ओर उनका झुकाव सहज था। किन्तु दूसरे मार्गों का समादर न करने की क्षुद्रता उनके अन्दर नहीं थी। उनकी तो यही उदात्त भूमिका थी कि ‘‘सब अपने-अपने प्रकार से विदेशी सत्ता को निर्मूल करने के लिए प्रयत्नशील हों, उसमें विचित्र कुछ भी नहीं है, अपने ही मार्ग का हठ धारण कर अन्य सब प्रकार के काम करनेवालों को हीन और हेय न मानते हुए सबके बीच जितना सम्भव हो सहयोग बना रहे’’। आजकल के राजनीतिक वातावरण में विभिन्न दलों के परस्पर ईर्ष्या-द्वेष को देखते हुए तो यह बड़े-बडों को भी स्पष्ट समझ में आ जायगा कि डॉक्टरजी के जीवन के इस सिद्धान्त को अपने अन्तःकरण में धारण करके सार्वजनिक जीवन में सहकार्य, हेलमेल तथा परस्पर पूरकता का वायुमणडल निर्माण करने के लिए प्रयत्न कितने आवश्यक हैं।



अपने उग्र स्वभाव के अनुसार सशस्त्र प्रतिकार उनको प्रिय था, फिर भी उसके मूल में राष्ट्रभक्ति की ही प्रेरणा होने के कारण अंग्रेज के पराये, शत्रु एवं शोषक होने पर भी केवल उसके विरोध का विचार उनके मन में रहे यह सम्भव नहीं था। अतः जिस राष्ट्र की भक्ति अन्तःकरण में है वह कैसा है, उसका स्वरूप क्या है, उसका शरीर अर्थात् दृश्यरूप किनके कारण बना है आदि मूलभूत प्रश्नों का उन्होंने गहन चिन्तन किया। प्राचीनतम भूतकाल से घटनेवाले तथा प्रत्यक्ष आँखों के समक्ष हुए प्रसंगों से उन्हें ‘‘अपनी पुण्यभूमि का राष्ट्रजीवन हिन्दू जीवन ही है’’ इस त्रिकालाबाधित सत्य का साक्षात्कार-चाहे बाल्यावस्था में उसकी अनुभूति वे सप्रमाण, स्पष्ट एवं असन्दिग्ध रूप से न बता पायें हों-पूर्ण रूप से हो गया। उनके जीवनकाल में तथा आज भी जिस अनैतिहासिक एवं असत्य तथा कथित सम्मिश्र राष्ट्रवाद का मण्डन एवं गुणगान किया जाता है वह बुद्धि और तर्क की कसौटी पर खोटा तथा विशुद्ध राष्ट्रभावनाओं को दुःखानेवाला है। इस खोटे राष्ट्रवाद के कारण ही अपने और पराये, राष्ट्रीय समाज और उसके शत्रु, विदेशी आक्रमक एवं उनके आक्रमणों से स्वदेश, स्वसमाज और स्वजीवन की विशेषताओं की रक्षा करने में प्राणपण से जूझनेवालों की परख करने में अक्षम्य घोटाला हुआ है। जब तक अपना राष्ट्र इस भ्रम एवं असत्य का आधार लेकर चलने का
हठ करता रहेगा तब तक उसके ऊपर एक के बाद एक अनिष्ट आते रहेंगे। अपमानित, असुरक्षित एवं संकटग्रस्त राष्ट्रजीवन का उत्तरोत्तर ह्वास होते हुए कदाचित् अन्त में उसके विनाश की घड़ी भी आ जाय, यह दुःखद प्रतीति पिछले चालीस-पचास वर्षों की घटनाओं से होती है। यदि पक्षाभिनिवेश, दुराग्रह एवं अन्य समाजों का भय मन में से निकाल कर अपने राष्ट्रजीवन का विचार किया तो परमपूजनीय डॉक्टरजी के पदचिन्हों पर चलते हुए हम सब यही कहेंगे कि ‘‘अपना हिन्दू राष्ट्र ही है, पहले था और अपने पराक्रम से आगे भी सदैव के लिए उसे सर्वश्रेष्ठ अवस्था में रखना है।’’ वास्तव में तो अपने राष्ट्र के विषय में पूर्वपक्ष-उत्तरपक्ष प्रस्तुत करते हुए उसे विवाद का विषय बनाकर ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ कहना भी परमपूजनीय डॉक्टरजी की उत्कट अनुभूति से विसंगत है। यह वाद नहीं हो सकता। हिन्दू राष्ट्र तो वादातीत सत्य है। अपने आराध्य हिन्दू राष्ट्र का परिपूर्ण साक्षात्कार होने के कारण ही उन्हें सम्पूर्ण संकट, सब बाधाएँ सहज प्रतीत हुईं तथा अपने उपास्य की भक्ति की प्रखर ज्वाला में व्यक्तिगत एवं कौटुम्बिक जीवन के आकर्षण और सब प्रकार का स्वार्थ जलाकर भस्म करने का अलौकिक आनन्द उन्होंने अनुभव किया। इस जीवन चरित्र में उनके स्वराष्ट्रशरण, निःस्वार्थ एवं भव्य व्यक्तित्व का दर्शन करने को मिलेगा। व्यक्तिगत आशा-आकांशा, मान-सम्मान आदि सम्पूर्ण स्वार्थों को भस्म कर राष्ट्रसेवक का विशुद्ध एवं परिपूर्ण स्वरूप यहाँ हमें दिखेगा। उनके सदैव प्रसन्न एवं हँसमुख जीवन का अभ्यास कर अपने अन्तःकरण में यह स्पष्ट छाप पड़ेगी कि खरा सुख एवं जीवन की सार्थकता का समाधान स्वार्थशून्यता में ही निहित है। स्वार्थरहित एवं ध्येयनिष्ठ जीवन ही विशुद्ध, पवित्र एवं चरित्रसम्पन्न रह सकता है। तथा परमपूजनीय डॉक्टरजी तो अन्तर्बाह्य शुचिता की साक्षात मूर्ति ही थे। उनकी ओर देखकर यही लगता था कि मानो शुचिता मानव-रूप धारण कर व्यवहार कर रही हो।



सार्वजनिक जीवन में चरित्र की रक्षा करने के सम्बन्ध में उदासीनता ही नहीं अपितु चरित्र आदि विषयों की अवहेलना करने की जो प्रवृत्ति चारों ओर दिख रही है उस पृष्ठभूमि में प्रखर पावित्र्य के तेज से चमचमाता उनका जीवन अधिक उभरा हुआ दिखेगा तथा अपने मन को आकृष्ट करता हुआ हमारे अन्तःकरण में भी अपने जीवन को शुचितापूर्ण एवं मंगलमय बनाने की प्रेरणा और विश्वास निर्माण कर सकेगा।



अनेक प्रकार देखने को मिलता है कि यदि कर्तृत्ववान् एवं गुणी व्यक्ति अनेक आपत्तियों में से मार्ग निकालता हुआ सफलता की ओर प्रशस्त होता है तो उसमें आत्मविश्वास के स्थान पर अहंकार उत्पन्न हो जाता है, स्वभाव उग्र हो जाता है, दूसरों को तुच्छ समझने की प्रवृत्ति होती है। यह सब होना तथा उसके कारण गैर-मिलनसारी की वृत्ति उत्पन्न होना स्वाभाविक होने पर भी इष्ट नहीं है। विशेषकर राष्ट्र-सेवा का व्रत लेनेवालों को तो इस प्रकार की प्रवृत्तियों को प्रश्रय देना सर्वथा अनुचित है। परमपूजनीय डॉक्टरजी को तो कुल-परम्परा से तेज-क्रोधी स्वभाव तथा आत्मनिर्भर रहने का स्वाभिमान प्राप्त हुआ था। इसके अतिरिक्त सभी संकटों का सामना करते हुए उन्हें परास्त कर अकेले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसी अतुलनीय संघटित सामर्थ्य उत्पन्न करने में उन्हें कल्पनातीत सफलता मिली थी। इस स्थिति में उनके मन में अहंकार, तुनुकमिजाजी आदि अवगुणों के उत्पन्न होने के लिए पर्याप्त अनुकूलता थी। परन्तु उनके जीवन की ओर देखने से पता चलता है कि वे इन सभी अवगुणों से सदैव अलिप्त रहे। उनके जीवन में तो सौजन्य, निरभिमानता, अहंकारशून्यता, मिलनसारी, स्वभाव एवं वाणी की मृदुता, प्रत्येक परिस्थिति में क्षोभरहितता आदि गुणों का ही परिपोष दिखता है। वंश-परम्परा से प्राप्त क्रोधी स्वभाव भी उनके बाद के जीवन में नहीं-सा हो गया था। ‘स्वभावो दुरतिक्रमः’ यह कहा गया है। किन्तु उन्होंने उसको भी जीतकर अपने काबू में कर लिया था। उनका यह स्वभाव-परिवर्तन इतना विलक्षण था एवं मनोवैज्ञानिक चमत्कार ही कहा जायगा। यह सब कैसे हुआ? उन्होंने यह सब विचारपूर्वक एवं प्रयत्नपूर्ण क्यों किया? यदि यह समझ लिया तो इस चमत्कार का थोड़ा-बहुत स्पष्टीकरण हो सकेगा।



अपने राष्ट्र के स्वरूप के निश्चित एवं स्पष्ट साक्षात्कार की अनुभूति होते ही उन्होंने राष्ट्र की अवनति, ह्वास और पराभव की मीमांसा सत्य मार्गदर्शक इतिहास के प्रकाश में की। ‘‘अपने समाज के व्यक्तियों में सामाजिक भावना का अभाव, मातृभूमि, धर्म, संस्कृति आदि का केवल तांत्रिक एवं औपचारिक स्मरण और पालन पर्याप्त नहीं है अपितु समस्त विदेशी आघातों से उसकी रक्षा के लिए जान को हथेली पर लेकर चलने की तैयारी रखनी होती है, इस विषय का अज्ञान सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्यों के प्रति उदासीनता, परस्पर की नित्य सहायता करने की तत्परता न होना, क्षुद्र स्वार्थपरायणता आदि इसी प्रकार के अनेक अवगुणों से व्याप्त होने के कारण समाज असंघटित, जर्जर एवं दुर्बल हो गया है तथा इस शक्तिहीनता से ही उसे पराभव, परतंत्रता एवं सभी क्षेत्रों में निकृष्ट अवस्था प्राप्त हुई है।’’ यह सत्य उन्होंने हृदयंगम कर सम्पूर्ण समाज के सम्मुख रखा। उन्होंने यह भी निष्कर्ष निकाला एवं देश को बताया कि इस दुरवस्था को दूर करने का एक ही उपाय है कि ‘‘व्यक्ति-व्यक्ति पर सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन के सत्संस्कार कर उन्हें एक सूत्रबद्ध एवं अनुशासित शक्ति के अंग के रूप में सिद्ध किया जाय तथा इस प्रकार के सभी व्यक्तियों के स्नेहमय व्यवहार, एकात्मता तथा राष्ट्र की समष्टि में अपने व्यक्तित्व को विलीन करने के गुणों के आधार पर एक अखिल देशव्यापी अनुशासित एवं संघटित सामर्थ्य का निर्माण किया जाय।’’



संघटन की बातें करना सरल है पर उसे व्यवहार में लाने के लिए आवश्यक था कि एक ऐसा तंत्र निर्माण किया जाये जिसके द्वारा शुद्ध राष्ट्रीय भाव एवं राष्ट्र समर्पित जीवन के संस्कार अन्तःकरण पर हो सकें और दृढ़ रह सकें तथा परस्परानुकूल स्नेहपूर्ण व्यवहार व्यक्तियों का स्थायी स्वभाव ही बन जाय। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए ही उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिदिन की शाखाओं के विशेष तंत्र का निर्माण किया, इसके लिए योग्य एवं अंगभूत व्यवहार का निर्धारण किया तथा अपने स्वयं के उदाहरण से-अपने दुरतिक्रम स्वभाव को भी बदलकर उस व्यवहार के अनुरूप बनाकर-उन्होंने असम्भव को भी सम्भव कर दिखाया। समर्पित जीवन का सामर्थ्य क्या क्या कर सकेगा ? यह कौन बता सकता है ? वंशगत संस्कारों को भी शुद्ध कर, अनिष्ट को नष्ट करने तथा इष्ट एवं आवश्यक गुणों की स्थापना एवं संग्रह करने की अति मानवीय शक्ति उन्हें सर्वस्वार्पण की वृत्ति से ही प्राप्त हुई थी। इस असामान्य शक्ति का परिपूर्ण दर्शन देनेवाली एक और बात का उल्लेख आवश्यक है। प्रस्तुत चरित्र को पढ़ते समय परमपूजनीय डॉक्टरजी की अनेक राजनीतिक गतिविधियों का हमें पता चलता है। अंग्रेज प्रत्यक्ष रूप से विदेशी था उसके अत्याचारी शासन की असह्यता अनुभव में आती थी। इस परिस्थिति में प्रत्येक विचारवान् व्यक्ति को यही लगता था कि अंग्रेजों को निकालकर पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना ही जीवन का प्रमुख कर्तव्य है। इस विचार से लोकमान्य ने अपने काल में समाज-सुधार या राजनीति के विवाद में राजनीति को असन्दिगध रूप से स्वीकार किया था और इसी आधार पर परमपूजनीय डॉक्टरजी कहते थे कि ‘‘परतंत्र राष्ट्र के लिए स्वतंत्रता-संग्राम के अतिरिक्त और कोई राजनीति नहीं हो सकती।’’ इसीलिए चुनाव, कौंसिल आदि की ओर उनकी सदैव उपेक्षा रही। अन्यान्य सामाजिक कार्यों की ओर भी उन्होंने इसी उद्देश्य से ध्यान दिया कि उनका स्वतंत्रता-संग्राम में उपयोग हो सके।



यद्यपि परिस्थिति के अनुसार उन्होंने राजनीति का अवलम्बन किया था, फिर भी राष्ट्र के उत्कर्षापकर्ष के कारणों की मीमांसा कर उन्होंने यह ध्यान में रखा कि स्पर्धा- ईर्ष्यादिपूर्ण प्रचलित राजनीति केवल अनुपयुक्त ही नहीं अपितु यदि पूरी सतर्कता नहीं बरती गयी तो हानिकारक भी सिद्ध हो सकती है। साथ ही यह सत्य पहचानकर कि राष्ट्र के उज्जवल भविष्य की आधारशिला उसका जागृत, अनुशासित एवं सुसंघटित सामर्थ्य ही है, उन्होंने परिस्थिति के आघात-प्रत्याघात, स्वकीयों की टीका एवं अवमानना आदि को हँसते-हँसते सहकर भी, उस तंत्र को खड़ा करने में अपना जीवन-सर्वस्व लगा दिया तथा अपने प्रारम्भिक जीवन में सशस्त्र क्रान्ति एवं कांग्रेस, हिन्दू महासभा आदि से जो सम्बन्ध बनाये थे उन्हें धीरे-धीरे सहज दूर कर दिया। उन क्षेत्रों के राष्ट्रभक्त नेताओं तथा उसके कार्य के विषय में मन में आदरभाव रखते हुए उन्होंने स्वयंसेवकों को यह सतर्कता बरतने को बताया कि उनके विषय में क्षण मात्र भी अनादर का भाव उत्पन्न न हो; किन्तु उन्होंने अपना आदर्श सबके सामने रखते हुए यह शिक्षा भी दी कि ‘‘इन कार्यपद्धतियों से दूर रहकर ही समाज-संघटन सम्भव है और वही प्रत्येक कार्यकर्ता को करना चाहिए।’’



बाल्यकाल से विविध राजनीति गतिविधियों में संलग्न, विदेशी राज्य के नाम मात्र से ही जो क्षुब्ध एंव क्रुद्ध हो जाये इस प्रकार अतीव संवेदनशील एवं उत्कट भावनापूर्ण व्यक्ति को प्रचलित राजनीति कार्यों से अपना हाथ खींचे बिना मन को हटा लेना तथा सब प्रकार से बुद्धि को जँचनेवाले कार्य के अनुकूल ही अपने मनोभाव को बनाना कितना कठिन हुआ होगा और इस प्रकार का परिवर्तन अपने अन्दर लानेवाले की विवेकशक्ति कितनी परा कोटी की और सामर्थ्यवान् होगी, तथा अपने निष्कर्षों एवं तदनुरूप कार्य पर उनकी निष्ठा कितनी अटल होगी इसकी कल्पना करना भी कठिन है। इस प्रकार का कल्पनातीत शक्तिसम्पन्न विवेक एवं कार्यैकनिष्ठा उनके पवित्र, निःस्वार्थ एवं राष्ट्रसमर्पित जीवन के कारण ही प्राप्त करना सम्भव था। यह उनके जीवन का अत्यन्त भव्य एवं अनाकलनीय चमत्कार है।


श्री गुरूजी द्वारा लिखित डॉ. हेडगेवार चरित्र की प्रस्तावना से