ज्ञान और कर्मयोग के अनन्य साधक सुदर्शनजी

कन्हैयालाल चतुर्वेदी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक श्री सुदर्शनजी का 15 सितम्बर को प्रात:काल रायपुर (छत्तीसगढ़) में निधन हो गया। प्रात:काल के भ्रमण के बाद कार्यालय आ कर उन्होंने प्राणायाम किया और फिर ऐसे लेटे कि उठे ही नहीं। इस प्रकार 18 जून 1931 के दिन रायपुर में ही जन्में सुदर्शनजी ने महाप्रयाण के लिए भी रायपुर को ही चुना|  उनका पूरा नाम कुप्पहली सीतारमैया सुदर्शन था। कर्नाटक के मंड्या जिले का गांव कुप्पहली उनका पैतृक निवास था। सीता रमैया उनके पिताश्री थे जो वन विभाग में कार्यरत थे तथा नौकरी के सिलसिले में वर्षों तक मध्यप्रदेश में रहे। उस समय तक छत्तीसगढ़ अलग प्रान्त नहीं बना था तथा मध्यप्रदेश में ही था। रायपुर में ही उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई और उसके बाद उन्होंने जबलपुर के इंजीनियरिंग कालेज में प्रवेश ले लिया। नौ साल की आयु से वे संघ की शाखा में जाने लगे थे। दूरसंचार में अभियांत्रिकी की शिक्षा लेते हुए भी वे विभिन्न दायित्व ले कर संघ का कार्य करते थे। हिन्दू संगठन के राष्ट्रीय कार्य में उनका मन ऐसा रमा कि 32 वर्ष की आयु में बीई करते ही उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन इसी पुनीत कार्य के लिए समर्पित कर दिया।


दुबला-पतला शारीरिक प्रमुख


वर्ष 1954 में वे संघ के प्रचारक बने तथा 1964 में मध्य भारत के प्रांत प्रचारक हो गए। अपार प्रतिभा और संगठन क्षमता के कारण पांच वर्ष बाद वे संघ के अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख बन गए। वर्ष 1987 में तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण लेते समय पहली बार उनके दर्शनों का सुअवसर मिला। आपातकाल के तीन वर्षों बाद यह प्रशिक्षण वर्ग नागपुर में आयोजित हुआ था। विनोद उनके स्वभाव में था अत: बैठक में जो पहला वाक्य उन्होंने कहा वह था।


''इतना दुबला-पतला शारीरिक प्रमुख देख कर आप सब को बड़ी निराशा हुई होगी!
 
उसी बैठक में उनकी ज्ञानार्जन की असीम आकांक्षा और नवीन सोच का भी परिचय मिला। पूरे आपातकाल में वे जेल में ही थे। बैठक में उन्होंने बताया कि जेल में एक जूडो-कराटे का उस्ताद भी था और उन्होंने उससे कई दांव सीखे। इसी प्रकार से सीखे हुए अनेक दांवों और युक्तियों से 'नियुद्ध का स्वरूप बना। संघ की दैनिक शाखाओं पर होने वाले कार्यक्रमों में नियुद्ध और योगासन प्रमुख हैं। इनको शारीरिक कार्यक्रमों में सुदर्शनजी ने ही सम्मिलित कराया। लयबद्ध योगचाप भी उन्हीं की देन थी। वे मौलिक विचारक थे तथा नवीन प्रयोगों पर जोर देने वाले क्रांतिधर्मी थे। पांच वर्षों बाद वर्ष 1983 में उनसे अत्यंत निकटता का अवसर मिला। तब कॉलेजों की परीक्षाएं काफी विलम्ब से होती थीं, अत: कॉलेज विद्यार्थियों के लिए अलग से संघ शिक्षा वर्ग आयोजित होते थे। अगस्त 1983 में झुंझुनू के खेमी सती मंदिर में प्रथम और द्वितीय वर्ष का राजस्थान का वर्ग लगा था। इस वर्ग में कार्यवाह वर्तमान के अ.भा. सम्पर्क प्रमुख हस्तीमल जी थे। शारीरिक प्रमुख नरेन्द्र  'मेघ थे तथा लेखक के जिम्मे वर्ग का बौद्धिक विभाग था। सुदर्शन जी 1979 में अ.भा. बौद्धिक प्रमुख बन गए थे। बौद्धिक विभाग में भी उन्होंने नये-नये प्रयोग किये और कई नवीनताएं प्रारंभ कीं। प्रतिदिन-सुभाषित, अमृतवचन, गीत तथा अन्य दिनों में चर्चा, कथा, समाचार समीक्षा और बौद्धिक वर्ग उनके प्रयासों से ही प्रारम्भ हुए। बहुत कम लोगों को पता होगा कि संघ के प्रारंभ के दिनों में जो 'प्रात: स्मरण होता था उसके रचनाकार व प्रणेता बाबा साहब आप्टे थे। सुदर्शनजी ने इसके स्थान पर 'एकात्मता स्रोत्र प्रारम्भ किया। वर्षभर उन्होंने इसके लिए परिश्रम किया और देश के प्रत्येक कोने के महापुरुषों का नाम इसमें जोड़ा। 'एकात्मता मंत्र भी उन्हीं की देन थी।


गीत की लय सिखाई


झुंझुनू के 83 के संघ शिक्षा वर्ग में अ.भा. बौद्धिक प्रमुख के नाते तीन दिन सुदर्शनजी भी रहे। स्वाभाविक रूप से उनसे निकट का सम्बन्ध आना ही था। वर्ग का वर्ग-गीत था-'उलझे सुलझे प्रश्नों का है उत्तर केवल एक, हिन्दू हम सब एक। इस गीत की लय ठीक से नहीं बैठ पा रही थी। बौद्धिक वर्ग के बाद सुर्दशन जी ने अधिकारी कक्ष में बुला लिया और बोले-गीत का लय ठीक करो। इसके बाद उन्होंने स्वयं गीत की लय बताई तथा दोहराने के लिए कहा। लय पूरी तरह ठीक हो जाने के बाद ही उन्होंने छोड़ा। अ.भा. बौद्धिक प्रमुख स्वयं गीत की लय का अभ्यास करायें, यह एक अभिभूत कर देने वाला अनुभव था। इसके बाद अनेक बार उनसे मिलने का सुअवसर मिला। जयपुर के उनके कार्यक्रम लगभग हर वर्ष बनते थे और विभिन्न कार्यक्रमों में उनको सुनने का अवसर मिलता था। ज्ञान का तो मानो वे अथाह भण्डार ही थे। संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी, बंगला, कन्नड़, असमिया, पंजाबी आदि भाषाओं पर उनका समान अधिकार था। मूल रूप से कन्नड़ भाषी होने के बाद भी वे राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी के प्रबल समर्थक थे। हिन्दी भी शुद्ध लिखी और बोली जाए इसका वे लगातार आग्रह करते थे। शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए, इसके लिए तो उन्होंने एक अभियान ही चला दिया था। इसी तरह स्वदेशी के प्रयोग पर भी सदैव जोर देते थे। बैठकों में भी कार्यकर्ताओं को अपने देश में तथा कुटीर उद्योगों में निर्मित वस्तुएं ही काम में लेने को कहते थे।देशभर में घूमते हुए भी वे अध्ययन के लिए कैसे समय निकाल लेते हैं, इसका हम सभी को आश्चर्य होता था। प्रत्येक विषय में वे निष्णात हैं,  ऐसा कार्यकर्ताओं को अनुभव होता था। अपने उद्बोधन में सप्रणाम तथा उद्धरण देते हुए अपनी बात रखते थे। शिक्षा से वे इंजीनियर थे, लेकिन इतिहास, भूगोल, समाज शा , राजनीति विज्ञान, दर्शन रआदि में भी उनकी जानकारी असाधारण थी।


पत्रकारिता के विद्वान


सन् 1990 में वे संघ सहसरकार्यवाह बने। उसी वर्ष उनका जयपुर आगमन हुआ। राजापार्क के आदर्श विद्या मंदिर में राष्ट्रीय सिख संगत के कार्यक्रम में वे आए थे। पत्रकारिता का अध्ययन करने वाली दो छात्राएं उनसे मिलना चाहती थीं। सुदर्शनजी ने उनको मिलने की अनुमति दे दी। उन दोनों को लेकर उनके पास पहुंचा और छात्राओं का परिचय कराया। पत्रकारिता का विषय आते ही सुदर्शनजी ने इस विषय की आठ-दस पुस्तकों के नाम लेखक सहित उनको बता दिए। हम लोग अवाक् रह गए और सोचने लगे कि पत्रकारिता जैसे विषय पर उन्हें इतनी गहन जानकारी कैसे हो गई? सचमुच में वे ज्ञान-योग के साधक थे। सुदर्शनजी के जीवन से एक और बात जो प्रत्येक कार्यकर्ता को सीखनी चाहिए, वह थी उनका अद्भुत जीवट। हृदय रोग के उपचार के लिए उन्होंने किसी एलोपैथी की दवा का आश्रय नहीं लिया। लौकी के रस से ही उन्होंने इसे काबू पाया। वर्ष 2000 में रज्जू भैया ने उन्हें सरसंघचालक नियुक्त किया। इस गुरुतर दायित्व एवं घोर परिश्रम के साथ नवीन रोगों का भी आक्रमण हुआ।


2005 में उनके पैरों में कष्ट रहने लगा था। इसके लिए भी उन्होंने होम्योपैथी का सहारा लिया। होम्योपैथी पहले रोग को बढ़ाती है और यदि त्वचा रोग हो तो उसका भीषण स्वरूप प्रकट हो जाता है। उनके दोनों पैर भी काले हो कर सूज गए थे। चलने-फिरने, उठने बैठने मे भी उन्हें अपार कष्ट होता था। यह सारा कष्ट उन्होंने स्थित-प्रज्ञ की तरह सहन किया। तय कार्यक्रमों, बैठकों आदि में उन्होंने कभी व्यवधान नहीं आने दिया। कर्मयोग की अखण्ड साधना वे दत्तचित हो करते रहे। वास्तव में तो ज्ञान-योग तथा कर्म-योग के साथ-साथ वे भक्तियोग के भी साधक थे। मातृभूमि के लिए अपने जीवन के कण-कण और क्षण-क्षण के समर्पण से बड़ा भक्ति योग और कौन सा होगा? उनका सम्पूर्ण जीवन योग साधना ही था। वर्ष 2009 में सरसंघचालक का दायित्व भी स्वेच्छा से उन्होंने छोड़ दिया और एक महायोगी की भांति ही उन्होंने देह त्याग कर दिया।


सुदर्शनजी को शत्-शत् नमन!