विधुत शवदाह गृह द्वारा पर्यावरण बचाने की मुहिम का आगाज़

अगर पर्यावरण सुरक्षित रखना है तो विद्युत शवदाह गृह अपनाना होगा।

जयपुर। पर्यावरण को शुद्ध बनाए रखने के लिए विद्युत शवदाह गृह में अंतिम संस्कार कराने की  मुहिम अब राजधानी जयपुर से शुरू हो रही  है। दाह संस्कार के लिए पेड़ों की कटाई रोकने और पर्यावरण संरक्षण के लिए नवीन पहल जयपुर जैन सभा समिति की और से रविवार को राजधानी जयपुर में आयोजित सर्व समाज की  एक बैठक के  माध्यम से की गई।

 

बैठक को सम्बोधित करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सुधांशु कासलीवाल ने कहा की चांदपोल स्थित विधुत मोक्षधाम गृह का  नए सिरे से पुनरुद्धार किया जा रहा है जो 31 मार्च तक पूर्ण कर लिया जायेगा। उन्होंने बताया की सर्व समाज के सहयोग से आमजन में जागरूकता उत्पन्न कर विधुत मोक्ष  धाम का अंतिम संस्कार के लिए उपयोग करने के लिए प्रेरित किया जायेगा। इसके लिए शीघ्र एक तदर्थ समिति बनाकर कार्य शुरू किया जायेगा। 

 

जयपुर जैन सभा समिति के संयोजक सुदीप बगड़ा ने बताया की  सामान्य तौर पर एक दाह संस्कार में तीन वृक्षों की

लकडि़यां जल जाती है। विद्युत शवदाह गृह से अंतिम संस्कार कराकर अनगिनत पेड़ों को कटने से बचाया जा सकता है। डॉ विनय सोनी ने कहा  लोगों में जब तक विद्युत शवदाह गृह को लेकर जागरूकता नहीं बढ़ेगी, तब तक पेड़ों का कटना जारी रहेगा। अगर पर्यावरण सुरक्षित रखना है तो विद्युत शवदाह गृह अपनाना होगा। विवेक काला ने कहा आज शमसान गृहों में जलाई लकड़ियों का कोयला हमारे घरों में पहुँचता है जो उचित नहीं है।

 

बैठक में गोविंददेवजी मंदिर के मानस गोस्वामी, संजीव गोधा, टोडरमल समारक भवन के महामंत्री परमात्म प्रकाश भारिल, खंडेलवाल समाज  के प्रकाश झालानी और चंद्र मोहन बटवाड़ा,  राजपूत समाज के उम्मेद सिंह,  पारीक समाज के बुद्धि प्रकाश पारीक, सामाजिक कार्यकर्त्ता मालती जैन, वरिष्ठ पत्रकार बाल मुकुंद ओझा, रामावतार आदि ने अपने विचार व्यक्त किये। वक्ताओं ने कहा की  पेड़ पर्यावरण संरक्षण में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इन्हें संरक्षित करने के लिए विद्युत शवदाह का विकल्प अपनाना होगा।

 

पारंपरिक पद्धति से दाह संस्कार में करीब तीन क्विंटल लकड़ी लगती है और वातावरण में 175 किलो कॉर्बन डाईऑक्साइड फैलता है। प्रदूषण रोकने के लिए जलाऊ लकड़ी का उपयोग कम करना जरूरी है जिसके लिए विद्युत शवदाह गृहों का उपयोग करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन है कि पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाया जाए। शवों को खुले में न जलाया जाए। अंतिम संस्कार में लकड़ी का इस्तेमाल रोकने और पर्यावरण की बेहतरी के लिए विद्युत शवदाह सबसे उपयोगी है। शवदाह स्थलों में रोजाना हजारों टन लकड़ी का इस्तेमाल हो रहा है, जिससे लाखों टन राख तथा कार्बन डाइऑक्साइड पर्यावरण को प्रदूषित कर रही है।

 

प्रदूषण कम हो इसलिए विद्युत शवदाह गृह जरूरी है। विद्युत शवदाह गृह में शव जलने से हवा प्रदूषित होने का खतरा काफी कम होता है। विशेषज्ञों के मुताबिक विद्युत शवदाह गृह स्क्रबर टेक्नोलॉजी से लैस होता है, जो शव जलने के दौरान निकलने वाली खतरनाक गैस और बॉडी के बर्न पार्टिकल को सोख लेता है। इससे इतर शवदाह गृह में शव जलाने में संपत्ति के साथ -साथ समय की भी बचत होती है। एक लाश को लकड़ी पर जलाने में कम से कम छह से सात हजार रुपये का खर्च आता है और तीन से चार घंटे का वक्त लगता है, जबकि मशीन से शव जलाने में बहुत कम खर्च आता है और समय एक घंटे से कम लगता है। वक्ताओं ने कहा की शिक्षण संस्थाओं, धर्म गुरुओं, पंडितों के माध्यम से विद्युत शवदाह गृह में अंतिम संस्कार  के लिए  लोगों को वृहत और जमीनी स्तर पर जागरूक करने की महती आवश्यकता है, तभी हम अपने उद्देश्यों में सफल होंगे।