विपश्यना का पहला कदम (आनापान): कल्याणमित्र श्री सत्यनारायण गोयन्का

सुख शांति किसे नहीं चाहिए? सभी तो जीवन में सुख-शांति चाहते हैं। पर जीवन तो जीवन है। सुख भी आता है, दुख भी आता है। जब बहुत दुखी हो जाते हैं तो व्याकुल हो जाते हैं। जब बहुत व्याकुल हो जाते हैं, व्याकुल हो जाते है तो क्या करें? भगवान बुद्ध ने बहुत आसान रास्ता बताया। बहुत आसान। बस, व्याकुलता आयी कि सांस का सहारा लेना शुरू कर दो। सांस आ रहा है। सांस जा रहा है। सांस को देखते-देखते देखोगे कि व्याकुलता दूर होने लगी। करके तो देखोहमारे यहां राजस्थान में एक कहावत है- “निस्सासो भल सिरजियो, आधो दुक्ख हरंत'-आधा दुःख तो इसी से खत्म हो जाता है। बहुत दखी आदमी, बहत दखी आदमी जरा इस ओर ध्यान देआधा दख तो गया। पर आधा तो निकाले ना। सांस देखने की आदत होनी चाहिए नाभगवान बुद्ध ने साधना का पहला कदम, पहला कदम सांस देखने का सिखाया। देखने का मतलब उसका रूप नहीं है। उसका रंग नहीं हैउसकी आकृति नहीं हैबस सांस को जानते हैं। आता है तो आता है। जाता है तो जाता है। बस, जैसे ही शुरु किया, कितना ही दुख क्यों ना हो, सांस के आने-जाने को देखते-देखते खत्म हो ही जाएगा और यह विद्या, यह तो पहला कदम है। यही विद्या आगे जाकर के सारे दखों से छुटकारा दिला देगी। इसे आनापान कहते हैं। आया सांस-जाना, गया सांस-जाना। आया सांस, गया सांसजान रहे हैं। एक शर्त है इसमें। इस शर्त को नहीं भूल जाना कि इसके साथ कही कोई शब्द नहीं जुड़ जाय। कोई शब्द जुड़ जाय तो हल्का हो जाएगा। साधना हल्की हो जाएगी। कोई कल्पना जुड़ गई, साधना हल्की हो जाएगी। कोई कल्पना जुड़ गई, साधना हल्की हो ही जाएगी। जैसा है वैसा है। हमारे देश के संतों ने खूब समझायाभगवान बुद्ध की इस शिक्षा को खूब समझाया। गुरु नानक देव ने कहा


“थापिआ न जाई, कीता न होई, आपोआप निरंजन सोई।" सांस आता है उस पर कोई थोप, स्थापन नहीं कर देना। इसके साथ कुछ और जोड़ न देना और करना कुछ नहीं। जो अपने आप सांस आता है. इसको कहीं प्राणायाम नहीं बना देनाप्राणायाम के अपने लाभ होते हैं परंतु जो मार्ग आगे जाकर के हमें दखों से मक्ति देने वाला है, उसमें कुछ जुड़े नहीं और कुछ करें नहीं। सांस लेने के लिए जोर नहीं लगायेंआपो आप। जैसा सांस आता है बस, उसे ही जानना है। आया तो आया। गया तो गया। बाईं नासिका से आया तो बाईं नासिका से आया। दाहिनी नासिका से आया तो दाहिनी नासिका से आया। और दोनों नासिका से आया तो दोनों नासिका से आया। कछ बदलने की कोशिश नहीं करनी है। जरा भी कोशिश नहीं करनी है। जैसा है, वैसा है। भगवान बुद्ध ने कहा-यथाभूत, जैसा है, वैसा है। बस जानना है। जब कोई जीवन में संकट आये, संकट आते ही रहते हैं। अनचाही होती है, मनचाही नहीं होती। मन व्याकुल हो जाता है। जब भी मन व्याकुल हो, किसी भी कारण से बस दो-चार सांस ले लोगे, देखोगे दुख हल्का हो गया। यह रोज करने की बात है। बस सुबह-शाम जब 15-15 मिनट करोगे तो देखोगे, व्याकुलता मिटती है कि नहीं। मन व्याकुल होगा ही नहीं। बहुत शांत, बहुत सुखी। अरे, भगवान की शिक्षा का पहला कदम ही सुख-शांति का कदम है।


आगे बढ़ोगे, कभी पूरा आनापान करोगे और आगे जाकर के पूरी विपश्यना करोगे। अरे, तब तो शांति का कहना ही क्या! कितनी पूरी विपश्यना करोगे। अरे, तब तो शा ही बड़ी दिक्कत आ रही हो। मन शांत रहेगा, शांत रहेगा। सुखी रहेगा, सुखी रहेगा। तो यह पहला कदम, भगवान की शिक्षा का, शांति का, सुख का पहला कदम-क, ख, ग; ए, बी, सी, डी.। पर काम तो करना ही है। सांस आया है तो आया है। जा रहा है तो जा रहा है। यही मन में जोड़ना नहीं कि यह आया, गया। तो फिर कोई शब्द जुड़ जाएगा। जोड़ना नहीं। जोड़ना नहीं। बस जानना है। आया है तो आया है। गया है तो जान लिया गया है। यों धीरे-धीरे मन एकाग्र होने लगेगाबहुत ही गहरे-गहरे राग में रहने वाला मन एकाग्र होने लगेगा। बहुत व्याकुल रहने वाला मन शांत होने लगेगा। करना पडेगा। किसी की कृपा से काम होने वाला नहीं । हाथ जोड़ कर कृपा मांगें, मेरी व्याकुलता दूर कर दो। मेरा दुख दूर कर दो। तो होता नहीं। धोखा है। हम ही अपना दुख दूर करने वाले हैं। हमें ही अपनी व्याकुलता दूर करनी है। और भगवान बुद्ध ने ऐसा सरल, आसान रास्ता बतायाजैसा है, वैसा है। सांस जैसा है, जैसा है, जान-बूझ कर तेज नहीं करना। जानबूझ कर धीमा नहीं करना। अपने आप धीमा होता है तो धीमा होता है।


तो सहज, स्वभाविक सांस है तो धीमा ही होता है। बस जानते रहेंगेआया सांस तो आया सांसगया सांस तो गया सांस। बात तो बड़ी छोटी-सी है। काम तो बहत छोटा-सा है पर यह पहला कदम हैभगवान की पावन शिक्षा का पहला कदम है। चलते, चलते, चलते उस अवस्था तक पहुँच जाएंगे, जहां सारे दुःखों से मुक्ति मिल जाए, व्याकुलता से मुक्ति मिल जाय। तो बस आज इस पावन जगह पर एक साथ बैठ कर, एकत्रित होकर, समग्र होकर इस सुख का आनन्द लेना है, सीखना है। सास कैसे आ रहा है, कैसे जा रहा है, यह देखी। बाया नासिका से आया तो बायीं नासिका से आया। दाहिनी नासिका से आया तो दाहिना नासिका से आया। बायीं से गुजरा तो बायीं से गुजरा दाहिनी से गुजरा तो दाहिनी से गुजरा। बस इतना ही। हम तो पहरेदार की तरह देख रहे हैं। करना-कराना कुछ नहीं। जबरदस्ती सांस नहीं लेना है। आया है तो अपने आप आता है। जा रहा है तो अपने आप जाता है। अपने आप आते-जाते सांस को शांतिपूर्वक देखना है। या जाएगा। और अब जो थोड़ा- सा सीखोगे, वह रोज शाम को 5-10 मिनट और सुबह 5-10 मिनट, उठते ही 5-10 मिनट देखोगे तो रात को नींद अच्छी आएगी और दिन भर मन बहुत शांत रहेगा। पहले कदम में ही लाभ है। भगवान के बताये हुए पूरे कदम उठाओगे, विपश्यना तक के पूरे कदम उठाओगे तब तो शांति ही शांति। सुख ही सुख। तो सुख-शांति का पहला कदम उठायें। शुरू करें। शुरू करें। सांस आ रहा हैसांस जा रहा हैयह मुँह से नहीं बोलना है। मन ही मन बोलना नहीं। केवल जानना है। आ रहा है तो जान लिया-आ रहा है। जा रहा है तो जान लिया जा रहा है। शुद्ध सांस, केवल सांससांस के साथ कोई नाम नहीं जुड़ जाय। नहीं तो बिगड़ जाएगा। आगे जाकर के कदम लड़खड़ा जाएंगे। आगे की साधना कमजोर हो जाएगी। कोई नाम नहीं जुड़े। बस सांस है तो सांस है। आया है तो आया है। गया है तो गया है। कोई आकृति नहीं जुड़े। किसी का ध्यान नहीं करने लगें। फिर जड जाएगा। बस सांस ही सांस। आया है तो आया है। गया है तो गया है


मन को शांत रखें। जैसे ही मन में कोई विचार आने लगा कि सांस को जरा-सा तेज कर लें। ज्यादा नहीं, जरा-सा तेज कर लें। दो- चार सांस जरा-से तेज लिये कि फिर स्वाभाविक सांस। मन में कोई विचार नहीं। कोई चिंतन नहीं। कोई कल्पना नहीं। बस सांस, केवल सांस


जब आंखें बंद हैं तो चश्मा लगाने की क्या जरूरत। चश्मा हटा दें। जो चश्मा नहीं लगाते हैं तो बड़ी अच्छी बात। मुँह बंद रखोसांस मुँह से नहीं लेना है। नाक से लेना है और सारा ध्यान नासिका के दो दरवाजों पर लगा दो। सांस अंदर आएगा तो इन्हीं दो दरवाजों में से और सांस बाहर निकलेगा तो इन्हीं दो दरवाजों से बाहर निकलेगा। बस लगातार पहरेदार की तरह मन कर लिया। सांस आ रहा है तो जान रहे हैं कि आ रहा है। जा रहा है तो जान रहे हैं जा रहा है। अगर सांस लंबा आया, लंबा गया तो उसे छोटा करने की जरूरत नहीं। अगर सांस छोटा आया, छोटा गया तो उसे लंबा करने की जरूरत नहीं। जैसा है, वैसा है। स्वाभाविक सास, नेचुरल सास-जैसा है, वैसा है।


और दसरी बात-शुद्ध सांस। इसके साथ और कुछ जड न जाय। इसके साथ कोई शब्द जोड़ दिया। कोई नाम जोड़ दिया कि कोई मंत्र जोड़ दिया तो शुद्ध नहीं रहा। यह जो आगे जाकर के विद्या सीखोगे ना, उसके लिए बहुत जरूरी है। शुद्ध सांस। केवल सांस। आया तो आया। गया तो गया। आते हुए सांस को आता हुआ जानें। जाते हुए सांस को जाता हआ जानें


भागने का मन करेगा। पुरानी आदत है। दो-चार सांस लेकर वह भाग गया। फिर ले आओ। फिर काम में लगा दो। खूब कोशिश करते रहना हैअपनी ओर से कोशिश करते रहना है। खब कोशिश करते रहना है। सांस ही सांस पर मन लगा रहे। इसको बलवान बनाना है ना। अपने मन को वश में करना है तो सांस पर बांधे रखेंगे। इधर-उधर भटकने नहीं देंगे। सांस ही सांस को जानें। सांस ही सांस को जानें।


बैठे-बैठे बहुत थक गये तो जी चाहे पांव बदलो तो भले बदल लो। परंतु जब-जब पांव बदलो, बहुत होले-होले, बहुत होले-होले, बहुत धीमे-धीमे। जब पांव बदलो तब कहीं ध्यान भंग न हो जाय। धीमे-धीमे उस वक्त सांस को भी जानते रहो। पांव बदल रहे हैं, सांस को भी जानते हैं


खूब समझदारी से काम करना है। खूब लगन से काम करना है। करते जाओ। करते जाओ। सफलता जरूर मिलेगी। जो मन वश में नहीं है ना। अब देखोगे कि धीरे-धीरे काम करते-करते वश में आया ना। खूब वश में आ जाएगा। मेहनत करनी होती है ना। किसी भी काम में सफलता प्राप्त करने के लिए बहुत मेहनत करनी होती है। तो जितनी भी मेहनत करोगे और सफलता मिलेगी। मिलेगी ही।


आया सांस तो आया सांस। गया सांस तो गया सांस।


सांस सांस को जानते, दृढ़ हो जाये ध्यान।


सब लोगों का हो भला, सबका हो कल्याण।।


खूब कल्याण हो, खूब मंगल हो।


तुमने आनापान की विद्या सीखी। अच्छी तरह समझ ली। क्या करना होता है। यह जो सांस अपने आप आ रहा है। अपने स्वभाव से आ रहा है। अपने आप जा रहा है। अपने स्वभाव से जा रहा है-उसे जानना है। यही करना है। इसके प्रति खब सजग रहेंगे। सांस भीतर आ रहा है तो भीतर आ रहा है। बाहर जा रहा है तो बाहर जा रहा है। उसके प्रति सजग रहेंगे। बस, इतना ही तो काम है और यही तो करना है। और यह करना सीख लिया तो अब तो घर में जाकर रोज-रोज करना होगासुबह-शाम, सुबह-शाम। जब भी समय मिले। बिस्तर से उठे, याद आई, बिस्तर से उठे तो बस गये। आंखें बंद कर ली। मुँह बंद कर लिया और सारा ध्यान नाक के दरवाजों पर-आ रहा है, जा रहा है। सांस आ रहा है, जा रहा है। बस, दस मिनट हो गया। उस समय नहीं कर पाये तो नहा धोकर अपना नाश्ता-वास्ता करेंगे और दस मिनट समय मिला तो दस मिनट कर लिया। इसी तरह शाम को आते ही 10 मिनट बैठ गये। बड़े फ्रेश हो जाएंगे। और उस वक्त नहीं बैठना चाहते है तो चलो सोने के पहलेपहले 10 मिनट बैठे। उसी तरह पालथी मार कर, आंखें बंद करकेसांस आ रहा है तो आ रहा है। जा रहा है तो जा रहा है। ऐसे रोज करते चले जाओगे तो देखोगे, बहुत लाभ मिलने लगा। लाभ नहीं मिले तो यह रोज-रोज काहे की कसरत, क्यों करें? अपना समय क्यों खराब करें? समय खराब करने के लिए नहीं। बहुत लाभ मिलेगा। निश्चित रूप से लाभ मिलेगा। क्या लाभ मिलता है? पहला बडा लाभ तो यह मिलता है कि तुम्हारी याददाश्त बड़ी तेज हो जाएगी और एक दूसरा बड़ा लाभ यह होगा कि तुम्हारा मन जो बहुत विक्षिप्त रहता था, वह बेचारा कहीं टिकता ही नहीं था, अब वह टिकने लगा। यह विद्या सीखने के बाद बहुत बड़ा सहारा मिलेगा। यह विद्या सीखने के बाद जो आदमी इतना नर्वस रहता है, घबराया रहता है उतना ही प्रायः जीवन में असफल रहता है, सफल नहीं हो सकता। मन में घबराहट रहती है, मैं कैसे करूंगा, मैं कैसे करूंगा। यह मुझसे कैसे होगा? तो इससे हीन भावना का शिकार हो जाता है। निकल जाएगी. यह विद्या सारी हीन भावना को निकाल देगी। कोई हीन भावना नहीं। कोई नर्वस पना नहीं।


तुम किसी स्वीमिंग पूल में जाकर तैरना सीखो तो कितनी घबराहट होती है। अरे, मैं कहीं डूब न जाऊं? कैसे तैरूंगा? यों घबराहट होती है। व्याकुल हो जाता है, बेचैन हो जाता है और उस समय कोई यह दे दे-यह हवा भरा ट्यूब है, यह टायर है। यह नहीं डूबता। इसके सहारे तू भी नहीं डूबेगा। इसका सहारा ले और तू भी तैरने लग जाएगा। बहुत बड़ा सहारा मिल गया तैरने के लिए। ठीक ऐसे ही यह सांस का सहारा मिल गया। कहीं डूबेंगे नहीं हम। अब तो तैरना आ गया तो क्या डूबेंगे। जहां जीवन में कोई कठिनाई आई, लिया सांस का सहारा। जहां कोई कठिनाई आई, लिया सांस का सहारा और यह सहारा बड़ा बलवान होगा, खूब बलवान होगा। जीवन में कोई भी कठिनाई आई, समस्या आई, अब क्या निर्णय ले। कोई कमजोर मन का आदमी होगा तो घबराएगा। अरे, मैं क्या करू? यह करूं तो कोई तकलीफ तो नहीं आ जाएगी? यह करूं या वह करूं, तो कुछ नहीं करता या करता है तो गलत करता है। तो ऐसी कोई बड़ी समस्या, विकट समस्या, कठिनाई आई तो बड़ा सोच-समझकर निर्णय लेना है और सोचना-समझना यही है कि दो मिनट अपने सांस को देख लिया-आ रहा है, जा रहा है। तो मन शांत हो गया और बहुत सही निर्णय होगाजो निर्णय होगा. सही निर्णय होगा और जो निर्णय होगा. सुंदर निर्णय होगा। ऐसा भी नहीं कि तुरंत निर्णय लिया तो गलत निर्णय ले लिया। ऐसा भी नहीं। तुरंत भी निर्णय होगा और सही निर्णय होगा। धर्म का जीवन जीना है ना


मन कमजोर है तो क्या करेगा, अपनी हानि कर लेगा। मन मजबूत कर लिया तो कोई गलत रास्ते पर नहीं जाएंगे। कोई मादक पदार्थ का सेवन नहीं करेंगे। बुरे लोगों की संगत नहीं करेंगे। अच्छों की संगत करेंगे। तो सुखी रहेंगे। अपना भी भला, औरों का भी भला। तो जीना आ गया ना। मन मजबुत करेंगे रोज-रोज साधना करेंगे तो काम होगा। यह जो यहां आकर विद्या सीख ली, तो बस, हमने जान लिया ना। रोज-रोज क्या करना। अरे नहीं, नहीं। रोज सुबह-शाम, सुबहशाम बहुत काम आएगी। रोज-रोज साधना करोगे तो काम आएगी। करेंगे नहीं, जैसे शरीर की कसरत करें नहीं तो क्या फायदा होगा? अपने शरीर को बलवान बनाने के लिए दिन में 2-3 बार जो शरीर को आहार देते हो, भोजन करते हो तो शरीर बलवान होता है। भोजन नहीं दिया तो कमजोर हो जाएंगे। वैसे ही तुम्हारे मन को भी भोजन चाहिए और यह जो 10-10 मिनट दिन में दो बार मन का भोजन मिला तो मन खूब बलवान हो जाएगा। जैसे शरीर को दो वक्त का भोजन नहीं दिया तो शरीर कमजोर हो जाएगा। तो रोज-रोज सुबह-शाम, सुबह-शाम करना ही है। यह नहीं छोड़ना। रोज-रोज सुबह-शाम, सुबह-शाम 10-10 मिनट करना ही है। यह नहीं छूटना चाहिए।


यह जो 10 मिनट तक सांस देखेंगे। उसके बाद एक और साधना, मंगल-मैत्री की साधना करेंगे। क्या साधना होती है मंगल मैत्री की? यह जो रोज-रोज, सुबह-शाम, सुबह शाम सांस देखते-देखते मन शांत होने लगेगा.... बहत बेचैन रहने वाला मन... बेचैनी खत्म हो गई। व्याकुलता खत्म हो गई। तो ऐसी ही शांति सबको मिले। ऐसा ही सुख सबको मिले, यह मंगल मैत्री की भावना है।


जब जब मन में कोई दर्भावना जागती है. मैल जागता है तो बड़ा व्याकुल हो जाता है, बड़ा दुखी हो जाता है। ऐसे ही जब मन शांत होगा तो बड़ी शांति मिलेगी, बड़ा सुख मिलेगा। तब मंगल-मैत्री की यह भावना करना सारे प्राणी ऐसे ही सुखी हों। सबका कल्याण होसबका मंगल हो


भवतु सब्ब मंगलं।


सौजन्य : ग्लोबल पगोडा में पू. गुरुजी का आनापान प्रवचन